शिक्षा में कुल गुणवत्ता प्रबन्ध (Total Quality Management)

(1) कुल (Total) – किसी संगठन के समस्त व्यक्तियों की समस्त गतिविधियों से संबंधित।

(2) गुणवत्ता (Quality) – किसी संस्था के कर्मचारियों तथा उपभोक्ता (Customer) के प्रत्येक मद में भी गुणवत्ता संदर्भित करता है। गुणवत्ता वह है जो उपयोक्तओं की माँग होती है।

· गुणवत्ता वस्तुओं अथवा सेवाओं को उनके प्रतिस्पर्धियों से भिन्नता का ज्ञान कराती है।

(3) प्रबन्ध (Management) – कार्य के संचालन, नियंत्रण व निर्देशन से।

TQM प्रारम्भ :- कुल गुणवत्ता प्रबंधन का प्रयोग उद्यम के क्षेत्र में प्रारंभ हुआ था परंतु वर्तमान समय में विभिन्न सेवा क्षेत्रों में इसका प्रयोग किया जाने लगा है। शैक्षिक प्रबंधन के क्षेत्र में भी शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति एवं शिक्षा के स्तर में सुधार, बालकों के बहुआयामी विकास, विद्यालय के उत्थान हेतु इस तकनीक का प्रयोग किया जाने लगा है।

परिभाषाएँ:-

· एडवर्ड डेमिंग – “कुल गुणवत्ता प्रबंधन (TQM) संगठनात्मक संस्कृति निर्माण का एक मार्ग है, जो कि कौशलों के निरंतर सुधार, समूह कार्य-प्रक्रिया, उत्पादन एवं सेवाओं की गुणवत्ता एवं उपभोक्ता संतुष्टि के प्रति वचनबद्ध रहता है।”

· जॉन रस्किन – “गुणवत्ता कभी दुर्घटना नहीं होती है। यह हमेशा बुद्धिमान प्रयास (Intelligent effort) का परिणाम होता है। यह एक श्रेष्ठ वस्तु उत्पन्न करने की इच्छा है।”

TQM अवधारणा –

· डब्ल्यू. एडवर्ड्स डेमिंग, जोसेफ एम. जुरान और आरमंड वी. फेजिनबॉम द्वारा संयुक्त रूप से विकसित।

· जनक – डब्ल्यू. एडवर्ड्स डेमिंग।

· कुल गुणवत्ता प्रबंधन कर्मचारियों और प्रबंधन का संयुक्त प्रयास है।

· डेमिंग पुरस्कार – कुल गुणवत्ता प्रबंधन का सर्वोच्च पुरस्कार।

· जुरान ट्रायलॉजी – जोसेफ एम. जुरान

        इसमें - गुणवत्ता योजना + गुणवत्ता नियंत्रण + गुणवत्ता सुधार

TQM उद्देश्य –

(1) संगठन का निरन्तर सुधार/उन्नति करना।

(2) निरन्तर एवम् अधिक से अधिक कीमतों में कमी।

(3) गुणवत्ता में निरन्तर एवम् अधिक से अधिक सुधार करना।

(4) पूर्णरूप से इस विचारधारा में सभी का सहभागी होना।

काइजेन (Kaizen) –

· कुल गुणवत्ता प्रबंधन अवधारणा जापानी शब्द काइजेन (Kaizen) से प्रेरित है।

· काइजेन का तात्पर्य है- ‘सुधार’ अथवा ‘अधिक उत्तम के लिए परिवर्तन।‘

· काइजेन किसी संगठन विशेष के ढाँचे एवं सभी प्रक्रियाओं में सुधार हेतु संगठन के उच्च स्तर से लेकर निम्न स्तर तक के सभी कर्मचारियों द्वारा किए जाने वाले निरंतर एवं संयुक्त प्रयास के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

· काइजेन अच्छे के लिए परिवर्तन (Change for good) की अवधारणा पर कार्य करता है।

काइजेन के मुख्य तत्त्व (Elements of Kaizen): –

● काइजेन का तात्पर्य, एक संगठन की प्रक्रियाओं एवं प्रकार्यों में परिवर्तन के माध्यम से निरंतर सुधार करना है। सामान्य शब्दों में संगठन की सफलता हेतु संगठन की संपूर्ण प्रक्रियाओं में काइजेन निरंतर छोटे-छोटे सुधारों के माध्यम से बड़ा परिवर्तन लाता है। जापानियों की मान्यता है कि किसी संगठन के भीतर उसकी नीतियों एवं संपूर्ण ढाँचे में छोटे-छोटे परिवर्तन के माध्यम से बड़ा एवं प्रभावी परिवर्तन लाया जा सकता है। काइजेन यंत्र के क्रियान्वयन हेतु संगठन के प्रत्येक स्तर का प्रत्येक व्यक्ति उत्तरदायी होता है न कि केवल एक।

● काइजेन के प्रमुख तत्त्व है-

         (1)    समूह कार्य (Teamwork)

         (2)    व्यक्तिगत अनुशासन (Personal discipline)

         (3)    सुधरा आत्मबल ( Improved morale)

         (4)    गुणवत्ता वृत्त (Quality circle)

         (5)    सुधार हेतु सलाह (Suggestion for improvement)

● इस प्रकार कुल गुणवत्ता प्रबंधन यह सुनिश्चित करता है कि संगठन का प्रत्येक कर्मचारी संगठन की दीर्घकालिक सफलता हेतु संगठन के ढाँचे, प्रक्रियाओं, सेवाओं एवं कार्य संस्कृति, में निरंतर सुधार हेतु प्रयास करता है।

कुल गुणवत्ता प्रबंधन की श्रेणियाँ (Categories of TQM): –

● कुल गुणवत्ता प्रबंधन चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. नियोजन स्तर (Planning phase)- नियोजन कुल गुणवत्ता प्रबंधन का प्रथम चरण है। इस स्तर पर ही कर्मचारियों की आवश्यकताओं एवं समस्याओं के समाधानों को सुनिश्चित किया जाता है। उनकी समस्याओं के कारणों को जानने का प्रयत्न किया जाता है। प्रत्येक उत्पाद अथवा सेवा हेतु आवश्यक क्रियाएँ सुनिश्चित की जाती हैं।
  2. क्रियान्वयन स्तर (Doing phase)- नियोजन स्तर पर सुनिश्चित की गई नीतियों के पालन हेतु इस चरण को अपनाया जाता है। नीतियों का क्रियान्वयन समस्याओं के समाधान हेतु किया जाता है। नीतियों एवं समाधानों की प्रभावपूर्णता भी इसी स्तर पर जाँची जाती है।
  3. निरीक्षण एवं जाँच स्तर (Cheking phase)- इस स्तर पर पूर्व एवं वर्तमान नीतियों तथा समाधानों का वास्तविक एवं संपूर्ण मूल्यांकन किया जाता है और दोनों कालों की नीतियों एवं समाधानों के बीच के अंतर द्वारा उनकी प्रभावपूर्णता का मापन एवं प्राप्त परिणामों का मूल्यांकन किया जाता है।
  4. क्रियात्मक स्तर (Acting phase)- इस स्तर पर कर्मचारी प्राप्त परिणामों का लेखा-जोखा रखने के साथ अन्य समस्याओं के समाधान ढूँढने हेतु प्रयास करते हैं।

कुल गुणवत्ता प्रबंधन मुख्य विचार (TQM The Main Ideas): –

● कुल गुणवत्ता प्रबंधन निम्नलिखित चार विचारों पर आधारित होता है-

  1. प्रथम प्रयास में सही करना ( Do it right the first time)- औद्योगिक क्रांति के बाद से प्रबंधकों ने अपने उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने में विशेष रुचि दिखायी है।

● इस संदर्भ में गुणवत्ता गुरुओं डेमिंग’ एवं ‘काउरुइशिकावा’ का विशेष योगदान रहा है, जिनके प्रयासों एवं विचारों के फलस्वरूप ही वर्तमान समय में किसी भी प्रकार के संगठन में वस्तुओं / सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाने एवं उनको प्रभावी बनाने पर विचार किया जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से गुणवत्ता पर दिए जाने वाले विचारों एवं प्रयासों को निम्नलिखित चार चरणों में देखा जा सकता है-

(a) गुणवत्ता का समायोजन उपागम (The fix it in approach to quality)- उत्पादन प्रक्रिया के अंत में गुणवत्ता निरीक्षक (quality inspector) द्वारा खराब उत्पाद की पहचान कर उसे पुनः कार्य लायक बनाना।

(b) गुणवत्ता का निरीक्षण उपागम (The inspect it in approach to quality)- निम्नस्तरीय निर्गतों (outputs) से बचने के लिए गुणवत्ता निरीक्षक द्वारा प्रक्रिया में प्रतिदर्श पर परीक्षण कर मशीनों की पुनर्स्थापना का सुझाव देना।

(c) गुणवत्ता का निर्माण उपागम (The build it in approach to quality)- उत्पाद जिन-जिन के हाथों से गुजरता है, उन सभी को उत्पाद से जुड़े दोषों की पहचान एवं उसमें सुधार के निर्देश देना। गुणवत्ता समस्या के कारणों की पहचान एवं उनके निराकरण पर इस चरण में विशेष ध्यान दिया जाता है।

(d) गुणवत्ता का संरचना उपागम (The design it in approach to quality)- जागरूक उपभोक्ता एवं संलग्न कर्मचारियों के प्रयासों से ही उत्पादन चक्र (production cycle) प्रेरित होता है। इस चरण में व्यक्तिगत योगदान प्रक्रिया एवं उत्पाद सभी में निरंतर सुधार पर ध्यान दिया जाता है।

● वर्तमान समय में प्रबंधक प्रथम दो उपागमों के आगे निर्माण एवं संरचना उपागम को अपनाने लगे हैं। आज गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए प्रबंधक केवल उपभोक्ताओं की अपेक्षाओं को ही पूरा नहीं करते, बल्कि उन्हें और ज्यादा देने का प्रयास करते हैं।

  1. उपभोक्ता केंद्रित बनना (Be customer-centred)- एक संगठन को आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार के उपभोक्ताओं की अपेक्षाओं को पूरा करना होता है। आंतरिक उपभोक्ता संगठन के ही अन्य सदस्य होते हैं जो अपनी सेवाओं की पूर्णता हेतु दूसरे सदस्यों के कार्यों पर निर्भर रहते हैं। कुल गुणवत्ता प्रबंधन प्रत्येक कर्मचारी जो कि बाह्य व्यक्तियों के साथ कार्य हेतु जुड़ा रहता है के उपभोक्ता केंद्रित होने की माँग करता है। उपभोक्ता-केंद्रित होने का तात्पर्य है-

(a) उपभोक्ता की आवश्यकताओं के प्रति जागरूक एवं तैयार रहना।

(b) उपभोक्ता की सुनना।

(d) उपभोक्ता के प्रति उपयुक्त ढंग से जवाबदेह होना।

(c) उपभोक्ता को संतुष्ट करना सीखना।

  1. निरंतर सुधार को जीवन का एक मार्ग बनाना (Make continuous improvement a way of life)- निरंतर सुधार हेतु एक जापानी शब्द काइजेन (Kaigen) का प्रयोग किया जाता है, जिसका तात्पर्य है. छोटी-छोटी इकाइयों में निरंतर सुधार लाकर संपूर्ण ढाँचे में सुधार लाना। काइजेन प्रयोगकर्ता गुणवत्ता को अंतिम लक्ष्य न मानकर अंतहीन यात्रा मानते हैं। वस्तुओं में सुधार हेतु वे निरंतर प्रयोग, माप एवं समायोजन करते हैं। शून्य दोष अर्थात् उत्तमता, इस मान्यता की बजाय काइजेन प्रयोगकर्ता समस्या लाने वाले कारणों की निरंतर पहचान करते रहते हैं सुधार हेतु निम्नलिखित चार उपाय अपनाये जा सकते हैं-

(a) वस्तुओं और सेवाओं की सुधरी हुई अधिक संगत गुणवत्ता।

(b) उत्पादन-चक्र समय में तीव्रता लाना।

(c) उपभोक्ता की मांग एवं बदलती तकनीक के अनुरूप परिवर्तन लाने हेतु लचीलापन बनाये रखना।

(d) कम लागत एवं दोषयुक्त उत्पादों में कमी करना।

● कुल गुणवत्ता प्रबंधन कम लागत और दोष में कमी रखते हुए उच्च गुणवत्ता प्राप्ति, गति एवं लचीलेपन को विशेष महत्त्व देता है। साथ ही कुछ पाने के लिए किसी अन्य वस्तु का त्याग नहीं करना पड़ता है।

  1. समूह कार्य एवं सशक्तीकरण का निर्माण (Build team-wrok and empowerment)- कुल गुणवत्ता प्रबंधन (TQM) कर्मचारी, उनकी आवश्यकताओं. महत्वाकांक्षाओं एवं अपेक्षाओं के इर्द-गिर्द निर्मित होता है। यह कर्मचारी-चालक है। यह कर्मचारियों को अपनी पूर्ण शक्ति लगाने पर बल देता है। जब कर्मचारी पूर्ण प्रशिक्षित, सभी संबंधित सूचनाओं से युक्त, निर्णय प्रक्रिया में सहभागी एवं परिणामों के लिए निष्पक्ष रूप से पुरस्कृत होते हैं, तब सशक्तीकरण का निर्माण होता है। कार्य को प्रभावी एवं पूर्ण कुशलता के साथ करने के लिए समूह (Team) को सृजनात्मक एवं सहयोगी ढंग से प्रत्येक विभाग से योग्यताओं को निकालने अर्थात् उनका पूर्ण उपयोग करने वाला होना चाहिए।

कुल गुणवत्ता प्रबंधन उपकरण / तकनीक: –

(TQM Tools / Techniques)

● कुल गुणवत्ता प्रबंधन के क्रियान्वयन हेतु निम्नलिखित तकनीकों का प्रयोग किया जाता है

  1. बेंचमार्किंग (Benchmarking)- प्रभावी कुल गुणवत्ता प्रबंधन हेतु प्रतियोगी बेंचमार्किंग पहली आवश्यकता है। बेचमार्किंग का मुख्य उद्देश्य किसी एक क्रिया में पूर्ण उत्तम बनना है। बेंचमार्किंग, पारस्परिक सुधार के उद्देश्य के साथ प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध उत्पादों/ सेवाओं के माप की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे उद्योगों में निरंतर परिवर्तन आता रहता है। यह सार्थक अंतर को मिटाने के लिए दो प्रतिद्वंद्वियों की सेवाओं के बीच रिक्तता की माप करती है। बेंचमार्किंग को उत्पादों, सेवाओं, प्रक्रियाओं एवं विधियों पर लागू किया जा सकता है।
  2. गुणवत्ता वृत्त (Quality cycle)- कुल गुणवत्ता प्रबंधन के विकेंद्रीकरण हेतु उपयोग किया जाने वाला उपागम गुणवत्ता वृत्त है। गुणवत्ता वृत्त कर्मचारियों (6-12) का एक छोटा समूह है, जो अपने क्षेत्र से जुड़ी कार्य संबंधी समस्याओं एवं गुणवत्ता की पहचान, विश्लेषण एवं समाधान हेतु एक निश्चित समयांतराल पर मिलते हैं। एक वृत्त विशेष के सदस्य एक समान कार्य क्षेत्र वाले होते हैं, इसलिए उनके द्वारा चयनित समस्याएँ भी समान होती हैं। गुणवत्ता वृत्त का आकार बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए, ताकि सदस्य सक्रिय रूप से अंतःक्रिया कर सकें और प्रत्येक सभी में अर्थपूर्ण ढंग से अपना योगदान दें। गुणवत्ता वृत्त की अवधारणा का विकास विशेषकर जापानी उद्यमियों द्वारा किया गया था। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(a) ऐच्छिक समूह (Voluntary group) – यह कर्मचारियों का ऐच्छिक समूह होता है, सदस्य अपनी इच्छा से समूह से जुड़ते हैं, प्रबंधन का इसमें कोई दबाव नहीं होता।

(b) छोटा आकार (Small size)- गुणवत्ता वृत्त 6 से 10 सदस्यों का छोटा समूह होता है। सामान्यतया सदस्य एक ही कार्य-क्षेत्र वाले होते हैं।

(c) नियमित सभा (Regular meeting)- गुणवत्ता संबंधी समस्याओं पर विचार हेतु सदस्य एक निश्चित समयान्तराल पर सभा करते हैं। वे कार्य दिवस के अंत में सामान्य कार्य घंटों में ही अपनी सभा करते हैं। इस सभा हेतु प्रबंधक से विचार कर पहले से ही समय निश्चित कर लिया जाता है। सामान्यतया ये सभाएँ सप्ताह में एक बार लगभग एक घंटे की होती हैं।

(d) स्वयं का लक्ष्य (Own agenda)- प्रत्येक वृत्त का अपना लक्ष्य या एजेंडा होता है। ये अपनी समस्याएँ स्वयं चुनते हैं और समाधान हेतु सुझाव देते हैं।

(c) गुणवत्ता पर विशेष ध्यान (Exclusive focus on quality)- गुणवत्ता वृत्त अपनी प्रकृति से गुणवत्ता संबंधी समस्याओं की पहचान, विश्लेषण एवं समाधान ढूँढने हेतु अस्तित्व में आता है। इसका अंतिम उद्देश्य संगठन की क्रियाओं में सुधार लाना ही होता है। इस प्रकार गुणवत्ता वृत्त संगठन के भीतर सहयोग, प्रभावी कार्य समूह समस्या समाधान योग्यता, स्व-अनुशासन, अंतर्वैयक्तिक एवं समूह संबंधों में सुधार, उपयुक्त संप्रेषण, सहभागिता, कार्य संतुष्टि, उत्पादकता एवं संगठनात्मक प्रभाव पर विशेष ध्यान देता है।

  1. सशक्तीकरण (Empowerment)- TQM कर्मचारियों के सशक्तीकरण एवं पूर्ति कर्ताओं तथा उपभोक्ताओं की निर्णय प्रक्रिया में योगदान पर निर्भर करता है। निरंतर सुधार हेतु इन सभी समूहों का योगदान आवश्यक है। सशक्तीकरण किसी एक कार्य क्षेत्र में लगे लोगों के बिना किसी अन्य की अनुमति के बिना स्वयं निर्णय लेने की शक्ति है। इस शक्ति के माध्यम से वृत्त के सदस्य स्वयं निर्णय लेने और उसके पालन में सक्षम हो जाते हैं। इस प्रकार सशक्तीकरण वृत्त के सदस्यों को अपने कार्य-क्षेत्र से जुड़े निर्णय लेने एवं आवश्यक वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराकर निर्णय के पालन अथवा क्रियान्वयन के योग्य बनाता है।
  2. आउटसोर्सिंग (Outsourcing) – उद्यम के विशेष कार्य क्षेत्र से जुड़े आंतरिक कार्यों के संपादन हेतु उद्यम के बाहर उच्च गुणवत्ता स्तर वाले स्वयं की इच्छा से चुने गए कार्य संपादकों से वृत्त के कार्य क्षेत्र से जुड़े कार्य करवाना।
  3. चक्र समय में कमी (Reduced cycle time)- उद्यम प्रक्रियाओं की पूर्ति हेतु किए जाने वाले प्रयासों को चक्र समय कहते हैं। यह अनावश्यक प्रयासों को हटाकर आवश्यक क्रियाओं को निश्चित समय में बाँधता है। चक्र समय में कमी उद्यम के संपूर्ण प्रदर्शन एवं गुणवत्ता में सुधार लाने में सहायक होती है।

● अतः कुल गुणवत्ता प्रबंधन वस्तुओं / सेवाओं के दोषों को दूर करते हुए उनमें निरंतर सुधार लाने की प्रक्रिया है ताकि अंतिम उत्पाद के रूप में एक पूर्ण उत्तम वस्तु / सेवा प्राप्त हो सके। शैक्षिक प्रबंधन के क्षेत्र में भी इसकी कुछ तकनीकों को अपनाकर विस्तृत शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सकती है। वर्तमान समय में शिक्षा के क्षेत्र में प्रत्येक दिशा में गुणात्मक ह्रास दिखायी देता है। समय-समय पर विशेषज्ञों नेताओं, समितियों की रिपोर्टों में शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर गुणात्मकता की कमी की दुहाई दी जाती है, परंतु इस गुणात्मकता को प्राप्त करने के लिए TQM की तकनीकों का पूर्ण कुशलता से उपयोग नहीं किया जाता है। यदि शैक्षिक प्रबंधन के अंतर्गत प्रत्येक क्षेत्र के विकास हेतु TQM की तकनीकों का पूर्ण कुशलता एवं प्रशिक्षण के साथ प्रयोग किया जाये तो भारत की शिक्षा व्यवस्था की गुणात्मक वृद्धि को कोई रोक नहीं सकता।

कुल गुणवत्ता प्रबन्ध की विशेषताएँ: –

● किसी भी संगठन में कुल गुणवत्ता प्रबन्ध की निम्न विशेषताएँ होती हैं-

  1. संगठन स्व-केन्द्रित होने की अपेक्षा ग्राहक-चलित (Customer-driven) हो जाता है ।
  2. परिणामों सहित पूर्व-व्यस्त होने की अपेक्षा प्रक्रिया पर एकाग्रचित्त हो जाता है।
  3. कर्मचारियों के हाथों से कार्य लेने के साथ-साथ उनके मस्तिष्क का भी उपयोग करना होता है ।
  4. पूर्ण संलग्नता, निरन्तर सुधार एवम् नेतृत्व ।

● इस प्रकार पूर्ण गुणवत्ता प्रबन्ध मानव-सम्बन्धोन्मुख दर्शन है जिसमें लोगों का प्रबन्ध करने में मौलिक परिवर्तन की आवश्यकता होती है।

कुल गुणवत्ता प्रबन्ध के मुख्य उद्देश्य: –

● किसी संगठन एवम् संस्था में कुल गुणवत्ता प्रबन्ध लागू करने के लिए निम्न उद्देश्य होते हैं-

  1. संगठन का निरन्तर सुधार/उन्नति करना।
  2. निरन्तर एवम् अधिक से अधिक कीमतों में कमी।
  3. गुणवत्ता में निरन्तर एवम् अधिक से अधिक सुधार करना।
  4. पूर्णरूप से इस विचारधारा में सभी का सहभागी होना।

शिक्षा में कुल गुणवत्ता प्रबंधन

    संकल्पना: -

● सामान्यतः शिक्षा के क्षेत्र में कुल गुणवत्ता प्रबंधन के सिद्धांतों का उपयोग, कुल गुणवत्ता की प्राप्ति हेतु किया जाने वाला प्रबंध, शिक्षा में कुल गुणवत्ता प्रबंधन है।

परिभाषाएँ-

(1) नवरत्नम् एवं ओ कोनोर (1993) के अनुसार- “शिक्षा में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन से आशय ऐसी शैक्षिक संकल्पनाओं, रचना कौशलों, उपकरणों, विश्वासों इत्यादि के समूह से है, जो अपव्यय तथा लागत खर्च को कम करके उत्पादों एवं सेवाओं के सुधार को परिलक्षित करते हो।”

(2) क्वान (1996) के अनुसार- ”शिक्षा में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन, शिक्षा के उद्देश्यों को वास्तविकता में क्रियान्वित करता है और इसका संबंध किसी भी शैक्षिक संस्था द्वारा अधिकाधिक गुणवत्ता प्राप्त करने का मार्ग पाने और संस्था की समालोचना करने से है।”

(3) स्पार्क (1996) के अनुसार- “शिक्षा में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन, उद्देश्यपूर्ण, उचित, सार्थक, अधिगम लक्ष्यों को विशेषीकृत करने और विद्यार्थियों द्वारा उन्हें पाने हेतु शक्ति सम्पन्न बनाना है।”

(4) स्विफ्ट (1996) के अनुसार- शिक्षा में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन द्वारा शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता प्रबंधन और गुणवत्ता नियंत्रण के माध्यम से सतत् सुधार किया जाता है।

(5) ओवलिया और एस्पिनवाल (1997) के अनुसार- “शिक्षा में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन शिक्षा व्यवस्था की गति को मजबूती और गति प्रदान करने वाला है। एक सर्वेक्षण या एक घटना विश्लेषण शिक्षा में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन से संबद्ध तत्त्वों की खोज करते है। तत्पश्चात हमें एक जाँच सूची उपलब्ध करवाते हैं जिसका प्रयोग हम शिक्षा व्यवस्था में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन के स्तर को जाँचने एवं मापने में करते हैं।”

(6) सेजवलकर (1999) के अनुसार- “अन्ततः संपूर्ण गुणवत्ता अनिवार्यतः पूँजी, प्रतिभा एवं परिश्रम के गहन निवेश से उपलब्ध उत्पाद होती है। संपूर्ण गुणवत्ता को सतही तौर पर नहीं पाया जा सकता है। संपूर्ण गुणवत्ता अचानक नहीं वरन चयन से आती है। पुनः संपूर्ण गुणवत्ता किसी आकस्मिक घटना के कारण नहीं अभिकल्प का परिणाम होती है। संपूर्ण गुणवत्ता कोई गंतव्य न होकर एक लगातार यात्रा होती है।

(7) साहने (2004) के अनुसार- शिक्षा में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में अपने ग्राहकों की आवश्यकताओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मार्ग में आने वाले अवरोधों को पहचानने और दूर करने की समग्र व्यवस्था और विचार है।”

(8) हार्य (1994) के अनुसार- “शिक्षा में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन का आशय संपूर्णता से नहीं वरन् परिवर्तन लाने से है।” शिक्षा में सामान्यतः यह परिवर्तन विद्यार्थियों के जीवन अनुभवों को परिवर्तित करके उनको उन्नत और शक्ति सम्पन्न बनाते हैं।

● शिक्षा में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन की समस्त परिभाषाओं के आधार पर इसके शैक्षिक अर्थ को समझना आवश्यक है, जो डेमिंग के द्वारा स्थापित संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन की मान्यताओं में परिलक्षित होता है।

शिक्षा में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन के मूल तत्त्व: –

         शिक्षा में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन के मूल तत्त्वों को निम्न विद्वानों के अनुसार निम्नलिखित प्रकार से देखा जा सकता है।

● जोजेफ सी. फील्ड्स (1994) के अनुसार- किसी शैक्षिक संस्था में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन के अंतर्गत सात प्रतिबद्धताएं आवश्यक है। इनको अपनाकर ही इसका अनुपालन सुनिश्चित किया जा सकता है।

         (1) कुल गुणवत्ता प्रबन्धन की प्रतिबद्धता

         (2) सदैव ग्राहक अभिमुखीकरण की प्रतिबद्धता

         (3) एक दल के रूप में कार्य करने की प्रतिबद्धता

         (4) स्वप्रबन्धन और नेतृत्व हेतु प्रतिबद्धता

         (5) सतत सुधार की प्रतिबद्धता

         (6) स्वयं अपनी और दल की क्षमताओं पर विश्वास करने की प्रतिबद्धता

         (7) गुणवत्ता हेतु प्रतिबद्धता

● जेरोम एस. एरकारों (1995) के अनुसार- संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन को किसी शैक्षिक संस्था में सफलतापूर्वक लागू करने के लिए निम्नलिखित पाँच पद आवश्यक हैं-

         (1) ग्राहक केन्द्रित        (2) कुल जुड़ाव

         (3) मापन                    (4) शिक्षा के लिए क्रमबद्ध योजना व्यवस्था

         (5) सतत सुधार

● मुखोपाध्याय व नरूला (1992) के अनुसार- “शिक्षा में कुल गुणवत्ता प्रबंधन में गुणवत्ता प्रबंधन के दो आयाम अंतर्निहित हैं। इनमें से एक संपूर्ण गुणवत्ता है और दूसरा है- गुणवत्ता प्रबंधन। इसमें अंतर्निहित है कि गुणवत्ता को समग्रता के रूप में ही देख सकते हैं, क्योंकि किसी भी क्षेत्र में एक क्रिया करने पर विद्यालय कार्यक्रम तथा विद्यालय प्रबंधन से जुड़े अन्य क्षेत्रों में प्रतिक्रियाओं की एक शृंखला प्रारंभ हो जाती है।” विद्यालय में कुल गुणवत्ता प्रबंधन के अनुप्रयोग को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत देख सकते हैं-

         (1)    संकल्पना, उद्देश्य और लक्ष्य- संकल्पना एक संस्था को       मार्गदर्शन प्रदान करती है। संकल्पना भविष्य के आने वाले वर्षों     में विद्यालय के स्वरूप का चित्रण करती है। उद्देश्य संकल्पना को             चिह्नित करते हैं तथा लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता करते है।

         (2)   शैक्षणिक प्रबंधन- शैक्षणिक प्रबंधन प्रक्रिया का मूल तत्त्व है।            इसमें प्रवेश पाठ्यचर्या, शिक्षण, परीक्षा और पाठ्येत्तर क्रिया      कलापों की योजना और प्रबंधन सम्मिलित हैं।

         (3)    कार्मिक प्रबंधन- कार्मिक प्रबंधन द्वारा संस्था में कार्मिकों की               भर्ती और पूर्व प्रशिक्षण, कर्मचारी विकास, कार्मिकों का          अभिलेख रखना, कर्मचारी संघ का प्रबंधन, कर्मचारियों की    बैठकें आयोजित करना, कर्मचारी कल्याण प्रबंधन, कार्य              आवंटन और प्रबंधन किया जाता है।

         (4)    वित्तीय प्रबंधन- शिक्षा संस्था में वित्तीय प्रबंधन के कई पहलू              हैं। इसमें बजट बनाना, संसाधन जुटाना, संसाधन विकास          करना, तथा इष्टतम उपयोग, संसाधन उपयोग लेखा और लेखा                 परीक्षा इत्यादि सम्मिलित हैं।

         (5)    आधारित संरचना प्रबंधन- आधारित संरचना संस्था के     भौतिक संसाधनों से तैयार की जाती है। इसमें भवन निर्माण      और विस्तार, भवन का उपयोग और अनुरक्षण, पुस्तकालय,              प्रयोगशालाएँ, दृश्य-श्रव्य साधन, छात्रावास, स्वच्छता, खेलकूद सुविधाएँ, व्यावसायिक शिक्षा सुविधाये इत्यादि अवयव और       कार्य कलाप सम्मिलित हैं। संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन जहाँ एक      ओर संसाधनों का इष्टतम उपयोग सुनिश्चित करता है, वहीं         दूसरी ओर यह शिक्षा का उच्च स्तर सुनिश्चित करता है।

         (6)    संपर्क और पारस्परिक संवाद प्रबंधन- संपर्क और           पारस्परिक संवाद प्रबंधन द्वारा संस्था के सभी कर्मचारियों का    आपस में, अभिभावक, पुरातन छात्रों, निकटस्थ पड़ोसी और        समुदाय, स्थानीय निकायों, पंचायतों, नगर निगमों, उच्च स्तरीय अधिकारियों, गैर-शैक्षिक प्राधिकरणों, शिक्षा संस्थाओं,        नियोक्ताओं इत्यादि का प्रबंधन किया जा सकता है। जो             विद्यालय की संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन को और उन्नत करने में        सहायता करता है।

         (7)    छात्र सेवाओं का प्रबंधन- इसके अंतर्गत कुल गुणवत्ता प्रबंधन              के संदर्भ में विद्यालयों में जीवन-स्तर में सुधार पर बल दिया जाए. परीक्षा में उपलब्धि पर नहीं। अतः छात्र सेवाएँ, संस्थाओं में         जीवन-स्तर में सुधार की कुंजी है। छात्र सेवा प्रबंधन की जाँच,       छात्र (और माता-पिता) सूचना तंत्र के सृजन और प्रबंधन,              मार्गदर्शन और परामर्श सुविधाएँ, छात्र-सुविधाएँ, प्रोत्साहन और     अन्य सुविधाएँ (छात्रवृत्तियां इत्यादि), निर्णय लेने में छात्रों की      भागीदारी के संबंध में की जा सकती है।

पद्धति और कार्य-प्रणाली: –

● शैक्षिक संस्थाएँ औपचारिक संस्थाएँ हैं। ये कतिपय नियमों और कार्य-प्रणालियों द्वारा अधिशासित होती हैं जो कि एक व्यवस्था अर्थात् राज्य सरकार अथवा केन्द्रीय विद्यालय संगठन के अंतर्गत आने वाली सभी संस्थाओं के लिए समान है। संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन से एक व्यवस्था का निर्माण होता है जो संस्था को इन नियमों के अनुसार आगे बढ़ने में सहायता करता है।

(1) संस्था का विकास- शिक्षा संस्था के प्रबंधन में तीन अवस्थाएँ सामने आती हैं। संगठनात्मक पतन, यथा स्थिति बनाए रखना, संस्थागत निर्माण के जरिए संगठनात्मक विकास संस्था का प्रमुख ‘धर्म’ निर्माण है और प्रधानाचार्य का धर्म संस्था में न तो यथास्थिति बनाए रखना है और न ही उसका पतन करना, बल्कि उसका विकास करना है। शिक्षक के लिए जो शिक्षण है, वही प्रधानाचार्य के लिए संस्था का विकास करना है।

(2) प्रबंधकीय उत्कृष्टता या कार्मिक प्रबंध- प्रबंधकीय उत्कृष्टता संस्थागत प्रबंधन के सभी पहलुओं में व्याप्त है और इससे आशय प्रबंधन और नेता के रूप में प्रधानाचार्य की व्यक्तिगत योग्यताओं से है। इस घटक में अपने आपको समझना, संप्रेषण-मौखिक और लिखित, नेतृत्व एक जुट करने की शक्ति और दलीय भावना विकसित करना, निर्णय लेना, विवाद प्रबंधन, अभिप्रेरणा प्रबंधन, समय प्रबंधन और परिवर्तन प्रबंधन इत्यादि सम्मिलित हैं।

(3) जॉन जे. बासटेंगल (2002) के अनुसार- “शिक्षा में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन के चार प्रमुख अंग होते हैं-

         1.  संबंध (विद्यार्थी+संस्था - आवश्यकताओं से संबंध)

         2.  सतत सुधार और स्वमूल्यांकन सुधार कार्यक्रम, स्वपर्यवेक्षण,       निष्पक्ष स्वमूल्यांकन

         3.  गुणात्मक व्यवस्था- नवाचार युक्त, समयानुकूल, प्रासंगिक           आवश्यकतानुसार,

         4.  संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन का नेतृत्व मजबूत, वैध, विश्वसनीय।”
AarambhTV Team
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