शैक्षिक पर्यवेक्षण एवं ​​​​​​​निरीक्षण (Educational Inspection)

शैक्षिक निरीक्षण (Educational Inspection)

·           सामान्य अर्थ- किसी व्यक्ति/वस्तु का अवलोकन एवं उसकी जाँच करना।

·           शिक्षा के क्षेत्र में अर्थ – शिक्षा संबंधी कार्यों का अवलोकन करने से है।

·           निरीक्षण का मुख्य उद्देश्य विद्यालयों में उपस्थित शिक्षकों, विद्यार्थी और प्रशासकों का विकास करना है।

परिभाषाएँ: –

(1)       वेबस्टर शब्दकोश के अनुसार- “निरीक्षण का अर्थ किसी व्यक्ति की जाँच करना है।”

(2)       डॉ. एस.एनमुखर्जी के अनुसार- “वरिष्ठ अध्यापक अथवा प्रधानाध्यापक द्वारा किए गए मूल्यांकन को निरीक्षण कहा जाता है।”

(3)       बर्टन के अनुसार- “शिक्षा निरीक्षण का उद्देश्य शिक्षण में उन्नति करना है।”

(4)       बाट और बर्टन के अनुसार- “निरीक्षण एक आधार है जिस पर शिक्षण में उन्नति के सभी कार्यक्रम बनाये जाने चाहिए।”

शैक्षिक निरीक्षण का उद्गम एवं विकास –

·           निरीक्षण के प्रत्यय का उद्भव इंग्लैंड में हुआ था।

·           सर्वप्रथम इंग्लैंड के बोस्टन नामक नगर में इस शब्द का प्रयोग किया गया। वहाँ विद्यालयों का निरीक्षण कार्य करने के लिये सन् 1909 में एक विशेष समिति की स्थापना की गयी।

·           इस समिति का कार्य सामान्य रूप से विद्यालय भवन की देखभाल करना, विद्यालय के लिये धन जुटाना तथा शिक्षकों की नियुक्ति पर ध्यान देना था।

·           इस विद्यालय के अधिकांश सदस्य अशिक्षित एवं अप्रशिक्षित होते थे उनमें कार्यक्षमता अधिक नहीं होती थी इसलिये वे निरीक्षण कार्य को भी अपर्याप्त एवं अनियन्त्रित ढंग से करते थे।

·           सन् 1914 से निरीक्षकों के क्षेत्र में शिक्षित व्यक्तियों का हस्तक्षेप प्रारम्भ हुआ। सुप्रसिद्ध विद्वान इलियट ने शिक्षक कार्य, शिक्षण कार्य, शिक्षण विधि एवं शिक्षण के उद्देश्यों के सम्बन्ध में अपने सुझाव दिये।

भारत में शैक्षिक निरीक्षण का विकास:-

·           भारत में निरीक्षण के इतिहास का आरम्भ वुड के घोषणा पत्र (1954) की संस्तुति के बाद होता है।

·           जिसके अनुसार प्रत्येक राज्य में एक ‘डायरेक्टर ऑफ पब्लिक निरीक्षक’ की नियुक्ति हुई थी। पुनः इन डायरेक्टरों के लिए शिक्षा की स्थिति का सही चित्र प्रस्तुत करने के लिए योग्य “इन्सपेक्टर ” की आवश्यकता सुझायी गई। इस इन्सपेक्टर का कार्य सामयिक रूप से स्कूल और कॉलेजों की स्थिति का विवरण सरकार को भेजना होता था। इनका कार्य परीक्षण कराना व उनमें सहयोग देना भी था। अतः प्रारम्भ से इन्सपेक्टर का कार्य एक प्रकार से नियमों को लागू करने तथा त्रुटियों का निर्धारण करने के लिए ही हुआ।

·           सन् 1919 में सेडलर कमीशन ने निरीक्षण की आलोचना करते हुए लिखा है कि निरीक्षण अधिकांश जल्दबाजी में होता है तथा पाठन विधियों और व्यवस्था के सम्बन्ध में मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों से रहित होता है, जो कि स्कूल निरीक्षण के लिए महत्त्वपूर्ण है।

·           सन् 1928 में साइमन कमीशन की स्थापना हुई। उसने तत्कालीन विद्यालय निरीक्षण की कमियों की ओर ध्यान दिया।

·           माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952-53) ने भी निरीक्षण की कमियों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि ऐसे अनेक दृष्टान्त हैं, जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि जो समय इन्सपेक्टर, इन्सपेक्शन पर बिताते हैं, वह कम हैं, बल्कि अधिक समय वे प्रशासनिक कार्यों में दिखाते हैं। इन्होंने निम्नलिखित कमियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया जो इस प्रकार है –

             i.       निरीक्षक शाला में प्रभुत्व, सर्वेसर्वा बनकर आते हैं, जो केवल               दोष ही ढूँढते हैं तथा आलोचना करते हैं।

             ii.      अधिकतर निरीक्षक औपचारिकता निभाने के लिए आते हैं। वे             न तो शैक्षिक विकास पर न ही स्कूल के विकास पर जोर देते हैं।

             iii.     निरीक्षक का दृष्टिकोण रचनात्मक न होकर विध्वंसात्मक होता है।

             iv.     स्कूलों की संख्या के अनुपात में निरीक्षकों की संख्या कम होती            है, अतः वे पूरे स्कूलों को नियमित रूप से नहीं देख सकते।

·           फोर्ड फाउंडेशन के तत्वावधान में एक अध्ययन दल ने भारतीय माध्यमिक विद्यालयों में प्रयुक्त निरीक्षण प्रक्रिया का अध्ययन किया तथा सुधार हेतु निम्नाकिंत सुझाव प्रस्तुत किए।

             i.       निरीक्षक द्वारा मानवीय सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए अपना             कार्य पूरा करना चाहिए और प्रशासक की भावना दूर होनी        चाहिए।

             ii.      इन्सपेक्टर का कार्य बजाय निर्णय के, सुझाव देना है।

             iii.     इन्सपेक्टरों के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत है।

             iv.     निरीक्षक को कई विधियों का ज्ञान होना चाहिए तथा उसको                कई भाषाएँ आनी चाहिए।

शैक्षिक निरीक्षण की विशेषताएँ: –

1.         निरीक्षण का उद्देश्य विद्यालय व्यवस्था तथा कार्य संचालन की जाँच करना है और निहित कमियों को उजागर करना है।

2.         विद्यालय निरीक्षण औपचारिक तथा समयबद्ध क्रिया है।

3.         निरीक्षण के परामर्श, सुझाव तथा नेतृत्व को कम महत्व दिया जाता है। आलोचना पर विशेष बल दिया जाता है।

4.         निरीक्षण कृत्रिम वातावरण में होता है। विद्यालय की वास्तविक संचालन व्यवस्था की जाँच नहीं होती है।

5.         निरीक्षणगण सभी पक्षों पर रिपोर्ट तैयार करते हैं जिसमें वस्तुस्थिति की समीक्षा तथा कमियों व अनियमिताओं का भी उल्लेख करते हैं।

6.         शैक्षिक निरीक्षण एक सूचना प्रदायी प्रक्रिया है।

7.         निरीक्षण काल में तथा उससे पूर्व प्राचार्य, शिक्षक तथा अन्य कर्मचारी अधिक सजग तथा क्रियाशील रहते हैं। निरीक्षण के कारण विद्यालय में सफाई तथा पुताई हो जाती है।

शैक्षिक निरीक्षण के उद्देश्य: –

(1)       बेहतर शिक्षक तैयार करना।

(2)       शिक्षकों को विद्यार्थियों की समस्याओं का निदान करने तथा उनकी योग्यता का मूल्यांकन करने में सहायता प्रदान करना।

(3)       स्कूल की शैक्षिक स्थिति के संदर्भ में शीर्ष नेतृत्व को सूचना उपलब्ध करवाना। 

(4)       शिक्षकों को उत्कृष्ट अध्ययन हेतु प्रेरणा प्रदान करना।

(5)       शिक्षा संस्थानों की आवश्यकता की जानकारी प्राप्त करना।

(6)       शिक्षण अधिगम प्रक्रिया एवं स्कूल की उपलब्धि का मूल्यांकन करना।

(7)       विद्यालय को प्राप्त अनुदान का प्रभावी उपयोग व नवीन विद्यालयों को मान्यता प्रदान करना।

(8)       शिक्षकों को पाठ्यक्रम निर्माण करवाने का ज्ञान प्रदान करना। तथा पाठ्यक्रम निर्माण के मुख्य उद्देश्य से अवगत करवाना।

(9)       शिक्षकों का अकादमिक एवं व्यावसायिक विकास करना।

पर्यवेक्षण :-           

·           पर्यवेक्षण प्रबंधन एवं प्रशासन का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अभिन्न अंग है। प्रबंधन के प्रमुख कार्यों- नियोजन, संगठन, निर्देशन, निर्णयन, नियंत्रण, मूल्यांकन आदि में पर्यवेक्षण का अति महत्त्वपूर्ण कार्य है जो संस्था के कर्मचारयों के बेहतर कार्य-निष्पादन तथा संस्थागत उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अति आवश्यक होता है।

·           प्रबंधन में उच्च स्तर के प्रबंधक, मध्यम स्तर के प्रबंधकों के कार्यों का, पर्यवेक्षण एवं मध्यम स्तर के प्रबंधक, निम्न स्तर के प्रबंधकों एवं अन्य कर्मचारियों की समस्त क्रियाओं का पर्यवेक्षण करते हैं।

·           वास्तव में पर्यवेक्षण मुख्य रूप से निम्न स्तर के प्रबंधकों से जुड़ा होता है, जो कर्मचारियों की क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। वे निम्न स्तर के समस्त कर्मचारियों के बीच की कड़ी के रूप में कार्य करते है।

·           एक पर्यवेक्षक दो विपरीत शक्तियों के बीच कार्य करता है, जिसे प्रबंधक एवं कर्मचारियों दोनों की आवश्यकताओं एवं इच्छाओं को संतुष्ट करने का प्रयास करना पड़ता है।

·           यह एक व्यवस्थित, वस्तुनिष्ठ, वैज्ञानिक निदेशनात्मक, गत्यात्मक एवं लचीली प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के सभी पक्षों के समुचित विकास द्वारा संस्थागत उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है।

पर्यवेक्षण का अर्थ :-

·           शब्द अंग्रेजी भाषा के Supervision का हिंदी रूपांतर है।

  ऐसी दृष्टि जो दिव्य अथवा अत्यंत सूक्ष्म हो, यह पर्यवेक्षण के अंतर्गत आता है। किसी संगठन की चहुँमुखी दिशाओं का सूक्ष्म अध्ययन करने एवं उनके विकास हेतु सुझाव देने को पर्यवेक्षण कहा जाता है।

पर्यवेक्षण की परिभाषाएँ:-

(1)       जी.आर.टेरी के अनुसार – “पर्यवेक्षण इच्छित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु मानव-प्रतिभा का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग एवं प्रबंधकों द्वारा संसाधनों रूपी सुविधाएँ उपलब्ध करवाना है जो मानव-प्रतिभा को चुनौतियाँ एवं रुचि प्रदान कर सके।”

(2)       बर्टन- “शिक्षा पर्यवेक्षण का उद्देश्य शिक्षण में उन्नति करना है। इसके आधार पर शिक्षण में उन्नति के सभी कार्यक्रम बनाये जाने चाहिए।”

(3)       बुंकन- “पर्यवेक्षण एक कुशल तकनीकी है जिसका प्रमुख ध्येय उन अवस्थाओं का अध्ययन एवं उन्‍नयन करना है जो सीखने एवं बाल विकास के आस-पास रहती है।

(4)       किंबाल “पर्यवेक्षण एक ऐसी सेवा गतिविधि है जो शिक्षकों को अपना कार्य अच्छे ढंग से करने में सहायता देती है।”

(5)       ब्रिसस व जसमैन- “पर्यवेक्षण करने का अर्थ शिक्षकों के विकास का समन्वय, उत्प्रेरण तथा निर्देशन है।”

(6)       एडम एवं डिके- “पर्यवेक्षण शिक्षण की उन्नति के लिए एक सुनियोजित कार्यक्रम है।”

(7)       मुरर एवं साम- “पर्यवेक्षण उन गतिविधियों का वर्णन करता है जिनका सीधा तथा प्रमुख सम्बन्ध उन अवस्थाओं का अध्ययन तथा उन्नति करना है जो शिक्षकों तथा बालकों को घेरे रहती हैं।”

(8)       फ्रान्सथ जेम- “उत्तम पर्यवेक्षण, व्यक्तिगत तथा सामान्य समस्याओं के हल के लिए व्यक्तियों की ऊर्जा को रचनात्मक विधियों में संलग्न करने की प्रक्रिया है।”

(9)       टेकसास शिक्षा एजेंसी- “पर्यवेक्षण उन व्यक्तियों के शिक्षण में उन्नति लाने के लिए एक प्रक्रिया है जो बालकों के साथ कार्य करते हैं। पर्यवेक्षण, शिक्षकों को अपनी सहायता स्वयं करने के लिए एक साधन तथा उत्प्रेरक विकास की एक प्रक्रिया है। पर्यवेक्षण कार्यक्रम एक शैक्षणिक विकास है।“

(10)    चेस्टर टीमैक्नवे– “पर्यवेक्षण शिक्षण प्रक्रिया का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने तथा निर्देशन देने की एक विधि है। पर्यवेक्षण का अंतिम उद्देश्य छात्रों को उत्तम शिक्षण सेवा द्वारा सभी स्तरों पर योग्य बनाना होना चाहिए।”

(11)    ग्लेन जी.आईतथा नेटजर– “पर्यवेक्षण विद्यालय प्रशासन का वह रूप है जिसका संबंध मुख्य रूप से शैक्षिक सेवा की आशाजनक तथा उपयुक्त उपलब्धियों से होता है।”

·          अतः पर्यवेक्षण को सम्पूर्ण अध्ययन-अध्यापन की क्रिया के विकास का नियोजित कार्यक्रम कह सकते हैं।

शैक्षिक पर्यवेक्षण (Educational Supervision)

शैक्षिक पर्यवेक्षण का अर्थ: –

·          शिक्षा के क्षेत्र में किया जाने वाला पर्यवेक्षण शैक्षिक पर्यवेक्षण कहा जाता है। शैक्षिक पर्यवेक्षण का शिक्षकों, सीखने की परिस्थितियों तथा छात्रों की उन्नति से गहरा संबंध होता है।

·     वास्तव में शैक्षिक पर्यवेक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जो शिक्षकों के व्यावसायिक विकास में, शिक्षण संस्थाओं की निरंतर उन्नति एवं छात्रों के सर्वांगीण विकास हेतु पूर्ण सहायता प्रदान करती है।

·          शिक्षा शब्दकोश (Dictionary of Education) के अनुसार शैक्षिक पर्यवेक्षण निम्नलिखित तत्त्वों से जुड़ा हुआ है-

            (1)    शिक्षण उद्देश्य, विधियों, सामग्रियों का चयन करना।

            (2)    पर्यवेक्षकों, शिक्षकों एवं कार्यकर्ताओं को नेतृत्व प्रदान करना।

            (3)    व्यावसायिक उन्नति हेतु प्रेरणा प्रदान करना।

            (4)    आवश्यक सुधार हेतु मूल्यांकन करना।

शैक्षिक पर्यवेक्षण की आवश्यकता: –

·          शैक्षिक पर्यवेक्षण की आवश्यकताओं को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है-

(1)           शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के विकास हेतु शैक्षिक पर्यवेक्षण आवश्यक है।

(2)       शिक्षकों को विशेषतापूर्ण तकनीकी सहायता प्रदान करने हेतु शैक्षिक पर्यवेक्षण की आवश्यकता है।

(3)       शिक्षकों के सतत व्यावसायिक विकास हेतु शैक्षिक पर्यवेक्षण अति आवश्यक है।

(4)       शैक्षिक संस्थाओं में कुशल नेतृत्व प्रदान करने हेतु शैक्षिक पर्यवेक्षण आवश्यक है।

(5)       शैक्षिक संस्थानों के प्रशासन में प्रजातांत्रिक सिद्धांतों के समुचित प्रयोग हेतु शैक्षिक पर्यवेक्षण आवश्यक है।

(6)       शिक्षकों को नवीन ज्ञान एवं कौशलों से परिचित करवाने हेतु शैक्षिक पर्यवेक्षण आवश्यक है।

(7)       विभिन्न शैक्षिक उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु शैक्षिक पर्यवेक्षक आवश्यक है।

(8)       शैक्षिक संस्थानों में शिक्षकों के उचित निर्देशन, समन्वय एवं मार्गदर्शन हेतु शैक्षिक पर्यवेक्षण आवश्यक है।

शैक्षिक पर्यवेक्षण के उद्देश्य: –

·          शैक्षिक पर्यवेक्षण के क्षेत्र के अंतर्गत विद्यालय, शिक्षक, छात्र, शिक्षण-विधि, कौशल, पाठ्यक्रम, परीक्षा प्रणाली, विद्यालयी सुविधाएँ आदि समस्त तत्त्व सम्मिलित होते हैं। इन सबकी एवं इनके साथ समुदाय एवं समाज की उन्नति हेतु शैक्षिक पर्यवेक्षण के उद्देश्य का निर्धारण वृहद दृष्टिकोण के अंतर्गत किया जाता है। शैक्षिक पर्यवेक्षण के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

(1)       शिक्षण संस्थाओं के विकास एवं प्रसार के माध्यम से समाज को सक्षम बनाना।

(2)       विद्यालयों का गुणात्मक विकास करना।

(3)       विद्यालयों की विकास प्रक्रिया में निरंतरता हेतु नवीन परिस्थितियों एवं नियमों के निर्माण को प्रोत्साहन देना।

(4)       सामुदायिक सहयोग हेतु आवश्यक विधियों एवं साधनों का ज्ञान करना।

(5)       शिक्षा के क्षेत्र में नवीन विधियों, दृष्टिकोणों एवं तकनीकों से शिक्षकों, प्रबंधकों, संरक्षकों आदि को परिचित कराना।

(6)       निर्धारित मानदण्डों के अनुरूप शिक्षकों, प्रधानाचार्यों एवं प्रबंधकों को आत्म मूल्यांकन योग्य बनाना।

(7)       संस्थागत योजनाओं के निर्माण एवं क्रियान्वयन में सहयोग प्रदान करना।

(8)       पाठ्यसहगामी एवं पाठ्येत्तर क्रियाओं को पाठ्य सामग्रियों के साथ-साथ विकास हेतु प्रोत्साहन देना।

(9)       छात्र, शिक्षक, प्रधानाचार्य एवं गैर-शिक्षणेत्तर कर्मचारियों की पारस्परिक समस्याओं का विश्लेषण कर उनके समाधान हेतु आवश्यक सुझाव प्रदान करना।

(10)    विद्यालय एवं समाज के मानवीय एवं भौतिक संसाधनों के समुचित उपयोग के माध्यम से संस्थागत लक्ष्यों की प्राप्ति में सहयोग प्रदान करना।

(11)    शिक्षण संस्थाओं की विभिन्न क्रियाओं के मूल्यांकन हेतु टोली पर्यवेक्षण प्रक्रिया का उपयोग करना।

(12)    शिक्षण संस्थाओं के समुचित विकास हेतु विभिन्न समितियों के निर्माण एवं उनके सफल संचालन हेतु आवश्यक ज्ञान प्रदान           करना।

(13)    संस्थागत मानवीय संबंधों में आवश्यक सुधार के माध्यम से संस्था को गत्यात्मक स्वरूप प्रदान करना।

(14)    विद्यालय अथवा शैक्षिक संसाधनों को समाजोपयोगी बनाने एवं समुदाय व समाज को शिक्षण संस्थानों के सफल संचालन हेतु सहयोगी बनाने हेतु आवश्यक प्रयास करना।

शैक्षिक पर्यवेक्षण की विशेषताएँ :-

शैक्षिक पर्यवेक्षण की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1)      शिक्षक विकास की प्रक्रिया

(2)      मैत्रीपूर्ण एवं प्रजातांत्रिक प्रत्यय    

(3)      तकनीकी सेवा

(4)      विद्यालयी अंत: क्रिया में सुधार

(5)      नीति निर्धारण करना

(6)      व्यावसायिक समस्याओं का निराकरण

(7)      नेतृत्व प्रदान करना

(8)      शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में सुधार लाना

(9)      सम्पूर्ण शैक्षिक संरचना का विकास

(10)    विश्लेषण करना

(11)    नियंत्रण करना

(12)    परामर्श प्रदान करना

(13)    पर्यवेक्षण प्रबंधक एवं कर्मचारियों के बीच संयोजक कड़ी

(14)    मानव-संबंध विशेषज्ञ

(15)    प्रेरणा प्रदान करना

(16)    प्रशिक्षण प्रदान करना

(17)    शिक्षण-अधिगम व्यवस्था में सुधार

(18)    निर्णयन प्रदान करना

(19)    सहभागिता बढ़ाना

(20)    उपलब्ध संसाधनों के प्रति जागरूक रहना

(21)    नीतियों एवं नियमों को जानना एवं बढ़ावा देना

(22)    समय एवं संसाधनों की हानि पर दृष्टि रखना

(23)    उचित वेतन निर्धारण की दिशा में प्रदर्शन का मापन

(24)    उच्च प्रबंधन स्तर को सूचित करना

(25)    कर्मचारी विचारों से अवगत होना

शैक्षिक पर्यवेक्षण का क्षेत्र: –

·           शैक्षिक पर्यवेक्षण का कार्य क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। शिक्षा के समस्त क्षेत्रों में पर्यवेक्षण का महत्त्व है। मुख्यतया इसके क्षेत्र को दो भागों में विभक्त करते हैं-

1.         शैक्षिक पर्यवेक्षण में निदानात्मक भूमिका

2.         शैक्षिक पर्यवेक्षण की मार्गदर्शन सम्बन्धी भूमिका

1.         शैक्षिक पर्यवेक्षण में निदानात्मक भूमिका

·           इसके अन्तर्गत निम्न बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाता है-

()     कक्षा शिक्षण निरीक्षण अनुदेशन के पर्यवेक्षण में कक्षा शिक्षण का निरीक्षण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। वस्तुतः समग्र शिक्षण में सुधार का आधार ही कक्षा शिक्षण निरीक्षण है। अतः जितना अच्छा एवं व्यापक कक्षा निरीक्षण होगा, उतना ही शिक्षक का व्यावसायिक उन्नयन एवं छात्रों की अधिगम प्रक्रिया का विकास किया जा सकता है।

             नीगले तथा एवान्स के अनुसार: –

             (1) प्रधानाध्यापक और शिक्षक के मध्य एक अच्छा सद्भाव बढ़ाने                 की दृष्टि से

            (2) शिक्षक की प्रगति के मूल्यांकन की दृष्टि से

            (3) समग्र सीखने की प्रक्रिया पर दृष्टिपात करने की दृष्टि से तथा

            (4) शिक्षक के शिक्षण के अच्छे और कमजोर पक्षों को जानने की दृष्टि से पर्यवेक्षण अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है।

(ब)      शिक्षकों द्वारा कक्षा में दिए गए कार्यों का पर्यवेक्षण शिक्षक कक्षा में जो कार्य करवाता है; जैसे- गृहकार्य, प्रायोगिक कार्य, पाठ सारांश आदि को निदानात्मक पर्यवेक्षण के अन्तर्गत लिया जाता है। इन कार्यों के अभिलेख से शिक्षक की योग्यता, विषय के प्रति तैयारी, विद्यार्थियों को दिए गए कार्यों का मूल्यांकन, शिक्षक की कार्य के प्रति निष्ठा आदि का पता लगाया जाता है।

(स)     शिक्षकों द्वारा प्रदत्त कार्यों का प्रधानाध्यापक द्वारा पर्यवेक्षण शिक्षक का कार्य बालक का सर्वांगीण विकास करना है। विकास के चरणों में अनेक पाठ्य सहगामी क्रियाओं को करना पड़ता है। ये कार्य बालक की विभिन्‍न योग्यताओं का विकास करते हैं। दक्षता के इन कार्यों को करने वाले शिक्षकों को प्रोत्साहन प्रदान करने तथा न करने वाले शिक्षकों को समुचित मार्गदर्शन करने या उचित कार्यवाही करने के लिए प्रधानाध्यापक को इन कार्यों का पर्यवेक्षण करना होता है। प्रधानाध्यापक को इन कार्यों को रुचि लेकर मूल्यांकन करना आवश्यक है।

(2)      शैक्षिक पर्यवेक्षण की मार्गदर्शन सम्बन्धी भूमिका: 

·          प्रधानाध्यापक को शिक्षकों की योग्यता का मूल्यांकन करने के पश्चात्‌ यह आवश्यक रूप से करना पड़ता है कि जहाँ शिक्षक का स्तर नीचे का हो; उसके स्तर को बढ़ाने के लिए तथा जहाँ स्तर औसत हो; उसे श्रेष्ठ बनाने के लिए शिक्षकों का मार्गदर्शन करना पड़ता है। इसे तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(अ)     शिक्षकों की व्यावसायिक समस्‍याएँ और पर्यवेक्षण:

·          प्रधानाध्यापक के लिए यह आवश्यक है कि शिक्षकों की व्यावसायिक योग्यता के विकास में योगदान दे। इसके लिए उसे सलाहकार की भूमिका का निर्वहन करना होता है।

(ब)          शिक्षण के गुण-दोष तथा पर्यवेक्षण प्रधानाध्यापक पर्यवेक्षक के रूप में यह देखता है कि शिक्षक के कमजोर पक्ष कौन-कौनसे हैं? इनको यथा संभव दूर कर शिक्षक के कौशल को विकसित करने का कार्य करता है। वहीं योग्य शिक्षकों की कार्यकुशलता में निरन्तर वृद्धि के लिए प्रोत्साहित करता है। नीगले तथा एवन्स ने पर्यवेक्षक की इस भूमिका को उसके नेतृत्व सम्बन्धी भूमिका का प्रमुख अंग माना है। जे. सी. अग्रवाल ने इस कार्य को पर्यवेक्षण का एक अत्यावश्यक कार्य माना है।

(स)     शिक्षकों की शिक्षेत्तर त्रुटियों को दूर करते हुए उनकी क्षमताओं का विकास से सम्बन्धित करना- पर्यवेक्षक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि त्रुटियाँ शिक्षक को व्यक्तिगत रूप से हतोत्साहित करने वाली नहीं हो। पर्यवेक्षक को चाहिए कि वह शिक्षक की त्रुटियों का परिमार्जन करें। इससे शिक्षक की क्षमताओं के विकास में सहयोग मिलता है। इसके लिए विभिन्‍न गतिविधियों का संचालन पर्यवेक्षक तथा शिक्षक दोनों मिलकर कर सकते हैं, यथा- प्रदर्शन पाठ आयोजित करना, पुस्तकालय व्यवस्था, सेमीनार, नवीन प्रयोगों को प्रोत्साहन देना, वर्कशॉप आयोजित करना, विषय गोष्ठी आयोजित करना, विस्तार भाषणों का आयोजन, फिल्म प्रदर्शन आदि।

·          पर्यवेक्षण के सभी क्षेत्रों का वर्णन करते हुए अपनी ‘पर्यवेक्षण’ नामक पुस्तक में बार बर्टनब्रुक नियर ने लिखा है कि पर्यवेक्षण की क्रिया के सीमा क्षेत्र में निम्नलिखित क्रियाएँ आती हैं –

(1)       पाठ्यपुस्तक का चयन –

            (अ) पाठ्यपुस्तक का चुनना,

            (ब) वितरण के स्तर का निर्धारण,

            (स) पाठ्यपुस्तकों के उपयोग सम्बन्धी सहायक उपकरणों का निर्माण,

            (द) प्रयोग में आ रही पाठ्यपुस्तकों का मूल्यांकन।

(2)       भवन, उपकरण तथा इनकी पूर्ति का अध्ययन

(3)       शिक्षकों के चयन, नियुक्ति, कार्य देने और स्थानान्तरण में सहायता करना

(4)       सामुदायिक क्रियाएँ

(5)       निरीक्षण

(6)       प्रशिक्षण सम्बन्धी क्रियाएँ

(7)       सर्वेक्षण, प्रतिवेदन तथा अभिलेखन

(8)       शिक्षण सामग्री की तैयारी

(9)       अनुसंधान

(10)    व्यावसायिक क्रियाएँ

(11)    शिक्षा सम्बन्धी प्रकाशन

(12)    सामान्य शिक्षा विकास का सर्वेक्षण

(13)    सामान्य प्रशासन

शैक्षिक पर्यवेक्षण के कार्य: –

शैक्षिक पर्यवेक्षण के निम्नलिखित कार्य हैं-

1.        नेतृत्व प्रदान करना: –

·          वांछित शैक्षिक उद्देश्यों की अधिकतम प्राप्ति हेतु पर्यवेक्षण संस्था के कर्मचारियों को नेतृत्व प्रदान करने का कार्य करता है। सर्वप्रथम लक्ष्य निर्धारण एवं इसके उपरांत कर्मचारियों को उद्देश्य प्राप्ति की दिशा में साथ लेकर चलना पर्यवेक्षण के द्वारा ही संभव हो पाता है साथ ही पर्यवेक्षण समूह के सभी सदस्यों को उपयुक्त परिस्थिति में स्वयं नेतृत्व करने के लिए भी प्रेरित करता है जो कि प्रजातांत्रिक दृष्टिकोण की पहचान है।

2.         उचित निर्देशन प्रदान करना: –

·           पर्यवेक्षण का एक अन्य प्रमुख कार्य निर्देशन करना है जिसके तहत प्रजातांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप संस्था के सदस्यों को अपने कौशल, गुण तथा विषय ज्ञान के आधार पर कार्य करने के लिए निर्देशित किया जाता है।

3.         संप्रेषण –

·           संप्रेषण के उचित माध्यम उपलब्ध करवाकर संस्था के समस्त कर्मचारियों तथा अधिकारियों के मध्य उचित संबंध स्थापित करने का कार्य पर्यवेक्षण का है। संप्रेषण द्वारा वह कर्मचारियों तथा अधिकारियों के बीच उत्पन्न होने वाले द्वंद्व तथा प्रतिकूल परिस्थितियों को रोककर सामंजस्यपूर्ण कार्य वातावरण का निर्माण करता है तथा अनुभवों व विचारों के मुक्त आदान-प्रदान को सहज बनाता है।

4.         समन्वय –

·           संस्था के कर्मचारियों के प्रयासों तथा कार्यों में समन्वय स्थापित करना भी पर्यवेक्षण का ही कार्य है जिसके द्वारा वह सभी को सहयोगी भाव से संस्थागत उद्देश्य प्राप्ति में संलग्न करवा पाता है।

5.        मानव संसाधन विकास –

·          शैक्षिक संस्थाओं में विद्यार्थी, शिक्षकों तथा अन्य कर्मचारियों के विकास में पर्यवेक्षण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षकों को कुशल नेतृत्व प्रदान कर उनके कौशल एवं ज्ञान का समुचित उपयोग छात्र कल्याण में हो तथा शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का उचित विकास हो इस हेतु पर्यवेक्षण सदा प्रयासरत रहता है।

6.        शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का विकास –

·          शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के सभी पक्षों; जैसे- छात्र, शिक्षक, कक्षा-कक्ष, पाठ्यक्रम, समय सारिणी, शिक्षण विधियों, बिल संसाधन, उपकरण, मूल्यांकन आदि के विश्लेषण के साथ-साथ उपयुक्त पक्षों के संभावित अधिकतम विकास से पर्यवेक्षण संबंधित है। शैक्षिक पर्यवेक्षण के द्वारा ही शिक्षकों के ज्ञान, कौशल, क्षमताओं तथा योग्यताओं में सुधार लाया जाता है जिससे विद्यार्थियों का उत्तरोत्तर विकास संभव हो सके।

·          वर्तमान रूप में शैक्षिक पर्यवेक्षण प्रजातांत्रिक सिद्धांतों तथा आदर्शों पर आधारित हो गया है जिसके द्वारा शिक्षकों एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों को रचनात्मक आलोचना तथा आवश्यक सुझावों के द्वारा सुधार किया जाता है। अब शैक्षिक पर्यवेक्षण पूर्व की भाँति भय, आशंका एवं आलोचना से त्रस्त न होकर सभी कर्मचारियों को लोकतंत्रात्मक तरीके से साथ लेकर संस्था के विकास में उचित मार्गदर्शक का काम करता है।

7.        उपयुक्त मानव संबंधों का विकास –

·          शैक्षिक पर्यवेक्षण का लोकतांत्रिक अवधारणा पर आधारित होने के कारण यह शिक्षकों के व्यक्तित्व, योग्यताओं, आवश्यकताओं, आकांक्षाओं तथा अंतर्संबंधों पर ध्यान देता है। व्यक्तिगत विभिन्नताओं को उचित महत्त्व देते हुए शैक्षिक पर्यवेक्षण शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के विकास में सहायता करता है। जिससे द्वंद्व की परिस्थितियों को रोकते हुए वाँछित उद्देश्यों की पूर्ति की जा सके तथा संस्था में उपयुक्त मानव संबंध बने रहें क्योंकि वास्तव में पर्यवेक्षण एक समूह गतिविधि है। अतः संस्था के विकास के लिए समूह को साथ कार्य करना आवश्यक है।

8.        उचित अधिगम वातावरण का विकास –

·          किसी शैक्षिक संस्था को अधिगम वातावरण का विकास करना शैक्षिक पर्यवेक्षण का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य है। संस्था के वातावरण में निहित विभिन्न सामाजिक, मनोवैज्ञानिक व संवेगात्मक विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षकों को निर्णय प्रक्रिया में उचित सहभागिता उपलब्ध करवाना, आवश्यक स्वायत्तता, सहयोग, निर्देशन तथा पुरस्कार की व्यवस्था करना शैक्षिक पर्यवेक्षण के कार्यक्षेत्र का मुख्य बिंदु है। जिसके द्वारा ही अधिगम वातावरण सहज, सरल व विस्तृत होता है।

9.        शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति –

·          शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का चहुँमुखी विकास करना है एवं इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु शैक्षिक पर्यवेक्षण उत्तरदायी होता है। शिक्षण प्रक्रिया के समस्त पक्षों का विकास कर पर्यवेक्षण छात्र, शिक्षक एवं समाज को लाभ पहुँचाता है। सामाजिक आकांक्षाओं पर आधारित पाठ्यक्रम, निर्माण, क्रिया-प्रधान शिक्षण विधियों के प्रयोग, शिक्षकों की व्यावसायिक उन्नति, वस्तुनिष्ठ एवं वैद्य मूल्यांकन प्रक्रिया के विकास, संसाधन उपलब्धता, उचित संस्थागत वातावरण के विकास द्वारा पर्यवेक्षण राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में प्रयासरत रहता है।

10.      मनोबल विकास में सहायक –

·          मनोबल कर्मचारियों की मनोवैज्ञानिक दशा है, जो उन्हें अपने कार्य करने व उद्देश्य प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। शैक्षिक पर्यवेक्षण कर्मचारियों व शिक्षकों के मनोबल को उच्च बनाये रखने का यत्न करता है जिससे उद्देश्यों की अधिकाधिक प्राप्ति संभव हो सके।

11.      कार्यसंतुष्टि का विकास –

·           उपयुक्त प्रशिक्षण देकर शैक्षिक पर्यवेक्षण कर्मचारियों की कार्यसंतुष्टि के भाव का विकास करने में सहायता करता है। यह समय-समय पर सही प्रयासों के लिए प्रशंसा तथा पुरस्कार देकर एवं कर्मचारियों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं, समस्याओं एवं आकांक्षाओं पर ध्यान न देते हुए उन्हें विकास के समुचित अवसर उपलब्ध करने से उनमें संस्था के प्रति समर्पण भाव तथा कार्य संतुष्टि का विकास करता है।

12.      समय एवं संसाधनों का समुचित उपयोग –

·           सीमित समय एवं संसाधन में लक्ष्य प्राप्त करने में पर्यवेक्षण अति सहायक है।

13.      उचित प्रेरणा प्रदान करना –

·           शैक्षिक पर्यवेक्षण शिक्षकों को लक्ष्य प्राप्ति हेतु प्रेरित करता है। जिससे वे संस्था विकास हेतु अपनी क्षमताओं के समुचित प्रदर्शन में सफल हो सके।

14.      कार्य के प्रति समर्पण भाव का विकास करना।

शैक्षिक पर्यवेक्षण के प्रकार :-

शैक्षिक पर्यवेक्षणों का विवरण निम्नलिखित हैं: –

(A)      भूमिका और दृष्टिकोण के आधार पर

·          भूमिका और दृष्टिकोण के आधार पर पर्यवेक्षण के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-

1.             निरीक्षणात्मक पर्यवेक्षण (Observational supervision):-

·          यह पर्यवेक्षण का वह स्वरूप है जिसमें पर्यवेक्षण अधिकारी सर्वज्ञाता होता है, उसका उद्देश्य केवल त्रुटियों का पता लगाना होता है। इसे आधिकारिक पर्यवेक्षण भी कहते हैं। इसमें आज्ञा, निर्देशों एवं नियमों पर विशेष बल दिया जाता है। इस प्रकार के पर्यवेक्षण में पूर्व निर्धारित मानदण्डों के अनुरूप उद्देश्यों की सफलता-असफलता का मूल्यांकन किया जाता है। साथ ही यह भी माना जाता है कि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के निरीक्षण हेतु भिन्न-भिन्न मानदण्डों का निर्धारण आवश्यक है। एक ही मानदण्ड प्रत्येक परिस्थिति के निरीक्षण हेतु उपयुक्त नहीं हो सकता।

2.         नियंत्रणात्मक पर्यवेक्षण (Controlled supervision): –

·           यह पर्यवेक्षण निरीक्षणात्मक अथवा आधिकारिक पर्यवेक्षण के ही समान है। अंतर केवल इतना होता है कि यह उचित क्रियाओं के लिए पुरस्कार एवं अनुचित क्रियाओं हेतु दण्ड आदि के प्रावधानों द्वारा अधीनस्थों की क्रियाओं को नियंत्रित करता है। इसके लिए आवश्यक तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जिनके माध्यम से अधीनस्थों की क्रियाओं का सही मूल्यांकन किया जा सके और कोई त्रुटि न होने पाए।

3.         सहयोगी अथवा लोकतंत्रीय पर्यवेक्षण (Collaborative or democratic supervision): –

·           इस प्रकार के पर्यवेक्षण में अधीनस्थों की समस्याओं का निदान एवं संगठन लक्ष्यों की प्राप्ति की जाँच जनतंत्रात्मक अथवा सहयोगी वातावरण में की जाती है। संगठन हितों की प्राप्ति में आने वाली समस्याओं के निदान हेतु अधीनस्थों को आवश्यक सहायता एवं सहयोग प्रदान किया जाता है। पर्यवेक्षक प्रेरणा प्रदान करते हुए एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण करता है ताकि अधीनस्थों की समस्याओं का समाधान भी किया जा सके और संगठन हितों की प्राप्ति हेतु उनकी क्रियाओं को भी आवश्यक दिशा-निर्देश प्रदान किया जा सके।

4.         वैज्ञानिक पर्यवेक्षण (Scientific supervision): –

·           इस प्रकार का पर्यवेक्षण क्रमबद्ध, वैध एवं विश्वसनीय होता है। यह आधुनिक तकनीकों एवं पूर्णतः वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित मापक यंत्रों के माध्यम से अधीनस्थ क्रियाओं का मूल्यांकन करता है। इसमें पूर्णतया वस्तुनिष्ठता विद्यमान रहती है।

5.         रचनात्मक पर्यवेक्षण (Constructive supervision): –

·           इस प्रकार के पर्यवेक्षण में अधीनस्थों के गुणों का पता लगाकर उनके विकास एवं विस्तार हेतु समुचित पर्यावरण सुविधाएँ एवं प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है। इस तकनीक के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ गुण अवश्य ही विद्यमान होते हैं। आवश्यकता केवल उन गुणों की पहचान कर उन्हें निखारने की होती है। ऐसी स्थिति में एक पर्यवेक्षक अपनी पैनी दृष्टि के माध्यम से अधीनस्थों के उन गुणों की पहचान करता है और संगठन हित में उनके विकास हेतु उचित अवसर प्रदान करता अथवा प्रबंधन के माध्यम से करवाता है।

(B)      व्यक्तियों की संख्या के आधार पर

·           इस प्रकार के पर्यवेक्षण के निम्नलिखित दो प्रकार होते हैं-

1.         पैनल पर्यवेक्षण ( Panel supervision): –

·           पैनल पर्यवेक्षण के अंतर्गत व्यक्तियों के समूह अथवा पैनल द्वारा पर्यवेक्षण क्रियाएँ संपन्न की जाती हैं। प्रायः ऐसे पैनलों में तीन या उनसे अधिक व्यक्ति पर्यवेक्षण के लिए नियुक्त किए जाते हैं। सामान्यतया व्यक्तियों की संख्या तीन ही होती है। जिसमें एक विषय विशेषज्ञ, दूसरा तकनीकी विशेषज्ञ और तीसरा विभागीय अधिकारी होता है। पैनल पर्यवेक्षण संगठन के विभागों, इकाइयों एवं क्रियाओं की सूक्ष्मता से जाँच अथवा मूल्यांकन कर अपनी रिपोर्ट देता है। शिक्षा जगत में इस प्रकार के पर्यवेक्षण को ही अपनाया जाता है।

2.         वैयक्तिक पर्यवेक्षण (Individual supervision ): –

·          इस प्रकार के पर्यवेक्षण में प्रबंधन द्वारा एक व्यक्ति पर्यवेक्षण के लिए नियुक्त किया जाता है और वह ही समय-समय पर संगठन, लक्ष्यों एवं कर्मचारी क्रियाओं का मूल्यांकन करता रहता है। इस पर्यवेक्षण में किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा मूल्यांकन करवाने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

प्रभावी शैक्षिक पर्यवेक्षण के गुण: –

·          प्रो. रॉबर्ट काहन के अनुसार पर्यवेक्षक के गुणों को मुख्यत: तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है जो निम्नलिखित हैं-

1.         मानवीय गुण (Human attribute): –

            लोगों के साथ कार्य करना और सहयोग स्थापित करना पर्यवेक्षक के समक्ष एक बड़ी चुनौती होती है। मानवीय गुणों का संबंध अन्य लोगों के साथ कार्य करने एवं उनके माध्यम से कार्य करवाने एवं समूह के सदस्य के रूप में प्रभावी व्यवहार करने से होता है। निम्नलिखित मानवीय संबंधों के माध्यम से पर्यवेक्षक में उचित मानवीय गुणों का विकास किया जा सकता है-

·          प्रत्येक व्यक्ति का उसके गुणों के आधार पर मूल्यांकन करना।

·          अधीनस्थों के व्यवहारों से पहले प्रवरों के व्यवहारों का विश्लेषण करना।

·          कर्मचारियों का उत्तम व्यवहार प्राप्त करने हेतु समूह सदस्यों के साथ मधुर एवं सहयोगी संबंध स्थापित करना।

·          समूह सदस्यों को नीति निर्धारण में सहभागी बनाना।

·          समान लक्ष्य हेतु क्रिया करना एवं समूह क्रियाओं में सुधार लाना।

·          समस्या-समाधान हेतु वस्तुनिष्ठ ढंग में सुधार लाना।

·          आवश्यक सूचनाएँ प्रदान करने के साथ-साथ स्पष्ट रूप से निर्देश देना।

2.         तकनीकी गुण (Technical attribute): –

·          किसी विशेष कार्य के प्रदर्शन हेतु आवश्यक समझ एवं दक्षता का होना तकनीकी गुण से संबंधित होता है। इस गुण से संबंधित कुछ दिशा-निर्देश निम्नलिखित हैं-

·          पर्यवेक्षण की जाने वाली विषय-वस्तु से जुड़ी आवश्यकता दक्षता का ज्ञान होना।

·          कर्मचारियों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर उन्हें स्पष्ट रूप से कार्यभार प्रदान करना।

·          व्यवस्था का ज्ञान, क्रियाविधियों, सामग्रियों, उपकरणों की विशेष जानकारी का होना।

·          लक्ष्यों की उचित दिशा में प्राप्ति हेतु आवश्यक सहयोग एवं सहभागी वातावरण निर्मित करना।

3.         संप्रत्ययात्मक गुण (Conceptual attirbute): –

·          संगठन को एक संपूर्ण व सशक्त संगठन के रूप में देखना और संबंधों को इसका एक भाग मानना संप्रत्ययात्मक गुण से संबंधित होता है। इन गुणों के विकास हेतु आवश्यक दिशा-निर्देश निम्नलिखित हैं-

·          संपूर्णता को उसके वृहद आयामों के रूप में देखना।

·          संस्थान की विभिन्न क्रियाओं के संदर्भ में दूरदर्शिता अपनाना एवं एक भाग में होने वाला परिवर्तन किस प्रकार दूसरे भाग एवं संपूर्ण संस्थान को प्रभावी करता है उसकी भविष्यवाणी करना।

·          संपूर्ण परिदृश्य को देखने की योग्यता, वृहद दृष्टिकोण एवं मित्रतापूर्ण अभिवृत्ति पर्यवेक्षण को प्रभावी बनाती है।

·          प्रत्येक विभाग की विभिन्न छोटी से छोटी क्रिया का अवधारणात्मक ज्ञान संपूर्ण संगठन की क्रियाओं को निर्धारित करने में योगदान देता है।

शैक्षिक निरीक्षण तथा शैक्षिक पर्यवेक्षण में अन्तर

शैक्षिक निरीक्षणशैक्षिक पर्यवेक्षण
इसका संबंध केवल विद्यालय की कमियों को ढूँढना है।इसका संबंध विद्यालय की सम्पूर्ण व्यवस्था से है।
इसका उद्देश्य केवल आँकड़ों, तथ्यों की जानकारी एवं सूचना प्राप्त करना है।इसका संबंध आँकड़ों, तथ्यों की जानकारी एवं सूचना प्राप्त करने के साथ-साथ उपयुक्त निर्देशन का कार्य किया जाता है। एवं सुझाव भी दिया जाता है।
यह अल्पकालीन होता है।जबकि शैक्षिक पर्यवेक्षण प्रतिदिन के कार्यों की देख-भाल से सम्बद्ध व्यक्तियों की कुशलता के विकास से सम्बन्धित है तथा इसमें प्रत्येक व्यक्ति के लिए शैक्षिक सुझाव व प्रेरणा-प्राप्ति की व्यवस्था रहती है।
इसकी विधि आधिकारिक है।जबकि शैक्षिक पर्यवेक्षण लोकतंत्रीय, सहयोगी एवं प्रेम की भावना से पूर्ण होता है।
इसमें सहायता एवं उत्तरदायित्व की भावना का अभाव होता है।जबकि शैक्षिक पर्यवेक्षण मुख्यत: इन्हीं दोनों तत्त्वों पर आधारित है।
यह केवल निरीक्षण कार्य तक सीमित हैजबकि शैक्षिक पर्यवेक्षण अध्ययन एवं विश्लेषण पर बल देता है।
यह प्राचीन अवधारणा है जो कि नकारात्मक दृष्टिकोण पर आधारित है।शैक्षिक पर्यवेक्षण अपेक्षाकृत नवीन अवधारणा है जो कि सकारात्मक दृष्टिकोण पर आधारित है।
इसमें निरीक्षकों की दृष्टि केवल अध्यापकों तक ही सीमित रहती है।जबकि शैक्षिक पर्यवेक्षण में शिक्षा के उद्देश्यों, विधियों, अध्यापकों, बालकों तथा समाज के वातावरण आदि सभी को दृष्टि में रखा जाता है।
इसमें नेतृत्व का अभाव है। इसमें निरीक्षण अपने अधीनस्थों को किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित नहीं करता है वरन् उन्हें उस कार्य को करने के लिए बाध्य रखता है।शैक्षिक पर्यवेक्षण सृजनात्मक नेतृत्व पर आधारित है, इसमें निरीक्षण अपने सहयोगियों को कार्य करने के लिए प्रेरणा एवं पथ-प्रदर्शन प्रदान करके अग्रसर करता है।
AarambhTV Team
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