संस्थागत नियोजन Planning in in Hindi

   नियोजन (Planning): –

·           वेबस्टर शब्दकोश के अनुसार- “नियोजन वह प्रक्रिया है, जो योजनाओं का क्रियान्वयन करता है, योजना पूर्व निश्चित कौशलों का निर्धारण करता है। उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए यह गठन कार्यक्रमों का संयोजन है।”

·           नेजविच के अनुसार- “नियोजन औपचारिक एवं विवेकपूर्ण क्रियाओं का समुच्चय है जिसके द्वारा भविष्य में आने वाली स्थितियों, दशाओं और चुनौतियों का पूर्वाभास करने का प्रयास किया जाता है जिससे कर्मचारियों तथा संस्था को अधिक प्रभावशाली ढंग से कार्य करने तथा इष्टतम साधनों के द्वारा संबंध उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए तत्पर बनाया जा सके।”

नियोजन की परिभाषाएँ :-

(1)       एलेन के अनुसार- “नियोजन भविष्य को बाँधने वाला जाल है।”

(2)       कून्ट्ज के अनुसार- “नियोजन, भविष्य में क्या किया जाना है, इसकी पूर्वधारणा है।”

(3)       आर. एलएकॉफ के अनुसार “नियोजन पूर्वनिर्धारित विनिश्चयीकरण है।”

(4)       ड्रॉर के अनुसार- “नियोजन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा भविष्य में किए जाने वाले कार्यों के लिए निर्णयों के समुच्चय को तैयार किया जाता है जो साधनों के द्वारा लक्ष्य प्राप्ति की ओर निर्देशित होते हैं।”

(5)       एलफॉर्ड एवं बेट्‌टी के अनुसार- “नियोजन बुद्धिमत्तापूर्ण क्रियाओं हेतु एक चिंतन प्रक्रिया, एक संगठित भविष्यवाणी एवं सत्य व अनुभवों पर आधारित दूरदर्शिता है।”

नियोजन/योजना निर्माण के स्तर:-

·           शैक्षिक योजनाओं का निर्माण विद्यालय स्तर से प्रारम्भ होता है, जो राष्ट्रीय स्तर तक होता है।

शैक्षिक नियोजन (Educational Planning)

·           शैक्षिक नियोजन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्ध संसाधनों का अधिक से अधिक लाभ हेतु किस प्रकार उपयोग किया जाए, इसका विवरण निहित होता है। शैक्षिक नियोजन ऐसे प्रयासों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है जिनके माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिक से लेकर उच्च स्तर तक, तकनीकी से वैज्ञानिक स्तर तक, बालक से वृद्ध तक सभी के लिए शिक्षा की व्यवस्था करने एवं शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति करना संभव हो पाता है। 

शैक्षिक नियोजन की आवश्यकता

(The Need of Education Planning): –

·           शैक्षिक नियोजन भविष्य विकास पर कुछ सीमा तक नियंत्रण करने का साधन है। अत: यह अत्यावश्यक है।

·           निम्नांकित बिंदु से शैक्षिक नियोजन की आवश्यकता को स्पष्टत: देख सकते हैं-

             –       यह संगठन की सफलता को सुनिश्चित करती है।

             –       कुशल एवं प्रभावी नियोजन धन, समय एवं प्रयास की बचत   करता है।

             –       नियोजन समस्या-समाधान का अच्छा उपाय है।

             –       समय के साथ गति बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

शैक्षिक नियोजन की विशेषताएँ-

(1)       लक्ष्यपरक                   

(2)       भविष्य आधारित

(3)       सतत प्रक्रिया               

(4)       समन्वित प्रक्रिया

(5)       प्राथमिक क्रिया           

(6)       मानसिक अभ्यास

(7)       लचीलापन                   

(8)       चयन हेतु विकल्प

                                           संस्थागत नियोजन (Institutional Planning)

·          संस्थागत योजना एक विस्तृत बहुमुखी कार्य-योजना है, जो संस्था की कमियों और खराबियों पर प्रहार करती है। यह एक ऐसा कार्यक्रम प्रस्तुत करती है जो वाँछित शैक्षिक उपलब्धियों को प्राप्त करने के उपायों को ढूँढने में सहायता देती है। इस कार्यक्रम में संस्था के वे समस्त क्रियाकलाप शामिल हैं जिनसे संस्था का सर्वांगीण विकास होता है।

·          संस्थागत योजना शिक्षा के व्यापक लक्ष्यों को पूरा करने का साधन है।

·          सबसे पहले संस्थागत नियोजन की सिफारिश मुदालियर शिक्षा आयोग (1952-53) ने की और उन्होंने “विद्यालय समुन्नयन योजना” नाम रखा।

·          शैक्षिक योजनाओं को सफल बनाने की शुरुआत कोठारी शिक्षा आयोग 1964-66 की सिफारिशों के बाद आरम्भ हुई थी। शिक्षा विभाग, राजस्थान ने अगस्त, 1968 में विद्यालय योजना की रूपरेखा निर्धारित की और उसे प्रकाशित किया। सन् 1972-73 से यहाँ के प्रत्येक प्राथमिक/उच्च प्राथमिक और माध्यमिक/उच्च माध्यमिक विद्यालय के लिए ‘विद्यालय योजना’ एक अनिवार्यता बन गई।

संस्थागत नियोजन का अर्थ: –

·          संस्थागत नियोजन किसी संस्था के भीतर संसाधनों के सर्वोत्तम प्रयोग को सुनिश्चित करता है। संस्था अपनी समस्याओं एवं विकास के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों को जानती है, इस कारण वह अपनी समस्याओं का समाधान भी ढूँढ सकती हैं। नियोजन के माध्यम से संस्था अपने पास उपलब्ध संसाधनों का अपनी समस्याओं के अनुरूप आवंटन करती है और नीतियों का क्रियान्वयन इस रूप में करती है कि समस्याओं का हल हो सके। संस्थागत नियोजन में शैक्षिक संस्था की समस्याओं के परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए नियोजन किया जाता है।

संस्थागत नियोजन की परिषाभाएँ: –

(1)       डॉ.एम. बी. बुच (1968)- “एक शैक्षिक संस्था द्वारा अपने अनुभव में आई आवश्यकताओं, प्राप्त अथवा प्राप्त हो सकने वाले साधनों के आधार पर निर्मित अपने विकास के लिए बनाया गया कार्यक्रम उस संस्था की संस्थागत योजना कहलाती है। यह दीर्घकालीन अथवा अल्पकालीन हो सकती है। यह विद्यालय एवं समाज के सभी साधनों में चरम उपयोग पर आधारित होती है।”  

(2)       जे.पीनायक “किन्हीं पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को निश्चित अवधि में प्राप्त करने के लिए आवश्यक साधन सुविधाओं का ध्यान रखते हुए भविष्य की कार्य विधि संबंधी लिए जाने वाले पूर्व निर्णयों का व्यवस्थित स्वरूप ही योजना है।”

(3)       .डब्ल्यूफ्रेंकलिन के अनुसार “संस्थागत नियोजन शिक्षा सुधार की यात्रा में ‘एक मील का पत्थर’ है। शैक्षिक संस्था की प्रक्रिया का संचालन नियमों के अनुकूल होता है। उसका उद्देश्य संस्था का उत्तरोत्तर विकास और समाज के लिए उसकी उपादेयता में निहित है। अत: संस्थागत नियोजन के तीन घटक हैं-

             (i) समाज,                   (ii) व्यक्ति                (iii) संस्था।”

संस्थागत नियोजन की विशेषताएँ: –

संस्थागत नियोजन की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1)       लक्ष्य निर्देशन

(2)       उपयोगिता

(3)       आवश्यकता आधारित

(4)       विशिष्टता

(5)       साधनों का दोहन

(6)       सुधार एवं विकास आधारित

(7)       प्रजातन्त्रात्मक मूल्यों का विकास

(8)       सहयोग पर आधारित

(9)       प्रेरणादायक

(10)     लचीली प्रक्रिया

(11)     यथार्थ- वास्तविक एवं व्यावहारिक

(12)     समय नियन्त्रित

संस्थागत नियोजन के उद्देश्य:-

संस्थागत नियोजन के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

(1)       शैक्षिक व्यवस्था उन्नयन करना।

(2)       मानवीय साधनों का भौतिक साधनों के पूरक में प्रयोग करना।

(3)       संसाधन उपलब्धता के आधार पर गुणात्मक विकास करना।

(4)       विद्यालय की समस्त समस्याओं का समाधान करना।

(5)       शिक्षक की स्वतंत्रता व सृजनात्मकता को प्रोत्साहित करना।

(6)       सह-शैक्षिक गतिविधियों का प्रभावी आयोजन करना।

संस्थागत नियोजन की प्रक्रिया

संक्षिप्त रूप में संस्थागत नियोजन की प्रक्रिया के चरण –

1.         विश्लेषण                                     

2.         सर्वेक्षण

3.         सुधार कार्यक्रम                            

4.         क्रियान्वयन

5.         मूल्यांकन

संस्थागत नियोजन के सिद्धांत :-

1.         उपयोगिता का सिद्धांत: – संस्थागत नियोजन में विद्यालय के समस्त मानवीय एवं भौतिक संसाधनों का अधिकतम उचित उपयोग किया जाता है जिससे कि संस्था के पूर्व निर्धारित किए गए लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सके।

2.         नेतृत्व का सिद्धांत:-  संस्थागत नियोजन में नेतृत्व करने का कार्य संस्था प्रधान या प्रधानाध्यापक के द्वारा किया जाता है। नेतृत्व जितना प्रभावशाली, कुशल और प्रशिक्षित होता है, संस्थागत नियोजन का संचालन भी उतने ही अच्छे ढंग से किया जाता है।

3.         समयावधि का सिद्धांत: – इसे दो भागों में बाँटा गया है-

            (a) दीर्घकालीन समयावधि सिद्धांत- इसे शिक्षा विभाग राजस्थान सरकार, प्रारम्भिक शिक्षा निदेशालय, बीकानेर और माध्यमिक शिक्षा निदेशालय बीकानेर द्वारा तैयार किया जाता है।

            (b) अल्पकालीन समयावधि सिद्धांत- इसे स्थानीय स्तर पर संस्था प्रधान द्वारा तैयार किया जाता है।

4.         आवश्यकता का सिद्धांत: – संस्थागत नियोजन को तैयार करते समय प्रधानाध्यापक को विद्यालय की समस्त मानवीय और भौतिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए; जैसे- स्वच्छ पेयजल व्यवस्था, खेल का मैदान, बालक-बालिकाओं के लिए पृथक्-पृथक् शौचालय आदि सभी।

5.         मूल्यांकन का सिद्धांत :- मूल्यांकन का शाब्दिक अर्थ- ‘निर्णय देना। संस्थागत नियोजन में समय-समय पर विद्यालय से संबंधित विभिन्न गतिविधियों और क्रियाकलापों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए, जिससे यह पता लगाया जा सके कि संस्था ने अपने पूर्व निर्धारित किए गए लक्ष्यों को कहाँ तक प्राप्त किया है या नहीं किया। प्रधानाध्यापक के द्वारा अर्द्धवार्षिक और वार्षिक स्तर पर मूल्यांकन प्रक्रिया को संचालित किया जाता है और मूल्यांकन पत्र के प्रारूप को भरकर जिला शिक्षा अधिकारी को प्रदान किया जाता है।

6.         विश्वसनीयता का सिद्धांत: – संस्थागत नियोजन को तैयार करते समय सही और विश्वसनीयता पर आधारित तथ्यों और आँकड़ों को काम में लिया जाना चाहिए जिससे सत्यता पर आधारित निष्कर्ष प्राप्त किए जा सकें।

संस्थागत नियोजन की आवश्यकता: –

·          संस्थागत नियोजन की आवश्यकता को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है-

(1)       विद्यालय योजना विद्यालय की अनुभूत आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। योजना के निर्माण का मुख्य लक्ष्य विद्यालय की शैक्षिक, सह-शैक्षिक, भौतिक एवं अन्य क्षेत्रों से संबंधित समस्याओं का निराकरण, अध्यापकों, छात्रों, अभिभावकों व स्वैच्छिक संस्थाओं के सहयोग से करना है।               

(2)       उपलब्ध मानवीय एवं भौतिक साधनों को सृजनात्मक रूप प्रदान करना और विद्यालय का गुणात्मक विकास करना।

(3)       संस्थागत (विद्यालय समुन्नयन) नियोजन द्वारा उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग और उनमें पारस्परिक सामंजस्य स्थापित करना, जिससे धन व समय की बचत हो जाती है।

(4)       विद्यालय के शैक्षिक, सह-शैक्षिक एवं भौतिक साधनों के कार्यक्रमों से संबंधित समस्याओं का सुनियोजित ढंग से समाधान खोजने में सहायक होती है अर्थात् असफलता के अवसरों को कम करना तथा सफलता की क्रियाओं को सुनिश्चित करना।

(5)       उपलब्ध मानवीय साधनों के सक्रिय सहयोग से भौतिक साधनों के अभाव की पूर्ति करना अर्थात् संसाधनों के आदान-प्रदान प्रक्रिया हेतु आधार बनाना।

(6)       ‘जनतांत्रिक’ आधार पर विद्यालय परिवार शिक्षक, शिक्षार्थी, प्रधानाध्यापक एवं अभिभावक सभी का विश्वास प्राप्त कर योजना बनाना एवं सफल क्रियान्विति का प्रयास करना।

(7)       प्रत्येक विद्यालय को अपने स्तर पर अपने विकास संबंधी कार्यों को सुनियोजित ढंग से चलाने हेतु योजना बनाना। एक अच्छी संस्था योजना राष्ट्र के विकास योजनाओं के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

(8)       शिक्षा में सुधार के लिए ऐसी योजना निर्मित हो जो सारे देश की प्रगति और उन्नति के अनुकूल हो।

(9)       शिक्षा योजना को सही दिशा प्रदान करने के लिए संस्थागत नियोजन की आवश्यकता होती है।

(10)    संस्थागत (विद्यालय समुन्नयन) नियोजन प्रत्येक अध्यापक की स्वतंत्रता तथा रचनात्मकता को प्रोत्साहित करती है।

(11)    संस्थागत (विद्यालय समुन्नयन) नियोजन से विद्यालयी शैक्षिक प्रगति के लिए विभिन्न क्षेत्रों में कार्यों के लक्ष्य निर्धारण तथा उनके सम्पादन की अवधि सुनिश्चित करना।

(12)    राष्ट्र की आवश्यकताओं की सम्पूर्ति के लिए योजना क्रियान्वयन हेतु संस्थागत योजना सहायक होती है।

(13)    विद्यालय प्रगति में सहयोगी क्षेत्रीय कार्यकर्ता को महत्त्व देने के लिए संस्थागत नियोजन एक सशक्त कड़ी है।

(14)    संस्थागत नियोजन से शैक्षिक विकेन्द्रीकरण को बल मिलता है।

(15)    जे.पीनायक के अनुसार “मेरे विचार में योजना में मुख्य सुधार यह होना चाहिए उल्टे पिरामिड (Ñ) की तरह दिखाई देने वाली योजना को व्यापक आधार दिया जाना चाहिए।”

संस्थागत नियोजन/विद्यालय नियोजन का क्षेत्र: –

·          राजस्थान में शिक्षा विभाग द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार प्रत्येक विद्यालय में एक ‘वार्षिक विद्यालय योजना’ तैयार की जाती है, जिसमें चार क्षेत्रों को शामिल किया जाता है जो निम्न प्रकार से हैं-

1. शैक्षिक क्षेत्रशैक्षिक सुधार कार्यक्रम2. सह-शैक्षिक क्षेत्रपाठ्य सहगामी क्रियाएँ3. भौतिक संसाधनों का क्षेत्र4. विविध क्षेत्र
· अध्यापक दैनिक डायरी।· पाठ्यक्रम विभाजन।· गृह कार्य सुधार।· श्रुतिलेख/वर्तनी सुधार।· नामांकन वृद्धि व ठहराव।· TLM का   प्रभावी उपयोग।· भित्ति पत्रिका।· निदानात्मक परीक्षण· उपचारात्मक शिक्षणएन.सी.सी.,स्काउटिंग,इको क्लबS.U.P.W. कैम्प।उत्सव व जयंतियाँ।प्रार्थना सभा।P.T.M./M.T.M.खेलकूद व्यवस्था।बुक बैंक।बालसभा।· भवन निर्माण।· पानी की टंकी।· खेल का मैदान।· साइकिल स्टैण्ड।· वृक्षारोपण।· फर्नीचर निर्माण।· प्रसाधन सुविधा।· छात्रावास निर्माण।· पुस्तकालय निर्माण।इसमें राष्ट्रीय महत्त्व के कार्यक्रमों की योजनाओं को सम्मिलित किया जाता है (विभाग द्वारा अपेक्षित कार्यक्रम)

राजस्थान शिक्षा विभाग में संस्थागत नियोजन: –

·          शिक्षा विभाग राजस्थान ने विद्यालय वार्षिक योजना के निर्माण के लिए दिशा-निर्देश दिए हैं। उन दिशा-निर्देशों के अनुसार वार्षिक योजना का स्वरूप निम्न प्रकार से है। आर.टी.ई., 2009 की धारा- 22 में उल्लिखित किया गया है कि प्रारम्भिक शिक्षा के लिए वार्षिक योजना ‘विद्यालय प्रबंधन समिति’ द्वारा तीन वर्षीय बनाई जाएगी। राजस्थान में विद्यालय योजना, 1968 से चल रही है। इसके दो स्तर हैं-

1.        विद्यालय स्तर पर विद्यालय योजना और

2.         जिला स्तर पर समेकित जिला योजना।

योजना निर्माण: –

·          उपलब्ध संसाधनों के आधार पर संस्था प्रधान वार्षिक योजना तैयार करता है और समस्याओं की प्राथमिकता को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। संस्था प्रधान यह सुनिश्चित करे कि विभिन्न क्षेत्र के प्रत्येक समुन्नयन बिन्दुओं को प्राथमिकता देनी है। संस्था प्रधान प्रत्येक समुन्नयन बिन्दु के (अ) कार्यक्रम प्रभारी (ब) समयावधि/स्थिति (स) कार्यपद का निश्चय करेंगे।

(1)      कार्यक्रमों की संख्या व चयन:- व्यावहारिक रूप से 1-3 कार्यक्रम हो, ताकि उनके लक्ष्य प्राप्त करना सम्भव हो।

(2)      योजना निर्माण के सोपान/मुख्य पद/चरण

            (i) कार्यक्रम का नाम                    (ii) प्रभारी व सहयोगी

            (iii) वर्तमान स्थिति                       (iv) आवश्यकता

            (v) उपलब्ध संसाधन                   (vi) लक्ष्य

            (vii) अवधि                                 (viii) क्रियान्विति के चरण

            (ix) मूल्यांकन

·          उक्त योजना बनाने के लिए निम्नलिखित बिन्दुओं की स्पष्ट अवगति प्रत्येक संस्था प्रधान को होनी आवश्यक है :-

(1)      क्षेत्रवार समस्याओं का सूचीकरण:- क्षेत्रवार समस्याओं की सूची बनाने पर समुन्नयन कार्यक्रम आसानी से चुने जा सकते हैं। ये सूचियाँ प्रतिवर्ष विद्यालय की आवश्यकतानुसार परिवर्तित हो सकती हैं।

(2)      चयन में प्राथमिकताओं का निर्धारण:- विद्यालय की क्षेत्रवार अनुभूत आवश्यकताओं तथा विभागीय अपेक्षाओं के अनुरूप ही समुन्नयन बिन्दुओं का चयन करना चाहिए।

·          योजना का प्रारूप:- संस्थागत योजना का प्रारूप तीन खण्डों में विभाजित होता है-

प्रथम खण्डद्वितीय खण्डतृतीय खण्ड
विद्यालय की सामान्य परिचयात्मक सूचनाएँ।गत सत्रों की क्षेत्रवार व कार्यक्रमवार उपलब्धियाँ।वर्तमान सत्र की कार्यक्रमवार योजना।
जैसे- विद्यालय का नाम, संक्षिप्त इतिहास, नामांकन, संस्थापन भवन, मैदान, पुस्तकालय, परीक्षा परिणाम, आर्थिक संसाधन (राजकीय कोष, छात्र कोष), संस्था प्रधान का नाम व योग्यता, विद्यालय परिवार व योग्यता।गत सत्र की वार्षिक योजना की उपलब्धियों का लेखा जोखा इस खण्ड में होता है; जैसे- क्षेत्र, कार्यक्रम, निर्धारित लक्ष्य, उपलब्धियाँ।योजना के क्रियान्विति के चरण-1. क्षेत्र2. कार्यक्रम का नाम3. प्रभारी4. वर्तमान स्थिति5. संसाधन6. लक्ष्य7. अवधि8. क्रियान्विति के चरण9. मूल्यांकन10. प्रबोधन
तृतीय खण्ड सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग होता है क्योंकि वर्तमान सत्र की योजना इसी में उल्लिखित होती है।

संस्थागत नियोजन के लाभ: –

·           संस्थागत नियोजन के लाभ निम्नलिखित हैं-

1.         आवश्यकता आधारित, न कि अनुदान आधारित (Need based not grant based): – संस्थागत नियोजन संस्था की आवश्यकताओं अथवा समस्याओं पर आधारित होता है, न कि संस्था को मिलने वाले अनुदानों पर। संस्था इन अनुदानों का प्रयोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु करती है और योजना बनाती है।

2.         संसाधनों का अनुकूलित उपयोग (Optimum utilisation of resources)– इस नियोजन में संस्था को अपने पास उपलब्ध संसाधनों एवं अपनी समस्याओं दोनों का पूर्ण ज्ञान रहता है। अतः संस्था अपने संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग कर पाती है। कौन-सा संसाधन किस समस्या हेतु आवश्यक है, इसका ज्ञान होने से नियोजन करते समय संसाधनों का अपव्यय नहीं हो पाता।

3.         लक्ष्यपरक (Goal-oriented)- संस्थागत नियोजन संस्था के विशिष्ट लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु किया जाता है। इस नियोजन में संस्था के लक्ष्य ही नियोजन के केंद्रबिंदु होते हैं और संपूर्ण नियोजन इन्हीं की प्राप्ति हेतु किया जाता है।

4.         भावी एवं विशिष्ट चेतना (Futuristic and specific plan)- संस्थागत नियोजन भविष्य में संस्था के विकास एवं समस्याओं के समाधान हेतु निर्मित विशिष्ट योजना है जो कि संस्था की विशिष्ट समस्याओं को दूर करती हैं और भविष्य में संस्था का उत्थान करती है।

5.         सुधारात्मक प्रेरणा (Improved motivation)- यह नियोजन एक सुधारात्मक प्रेरणा के रूप में कार्य करता है जो भविष्य में संस्था द्वारा निर्मित होने वाली अन्य योजनाओं को अतीत की कमियों से दूर रहने की प्रेरणा देता है। अतीत की योजनाओं में आने वाली कमियों को दूर करने के उपाय आने वाली पीढ़ी को समझाता है।

6.         विद्यालयी सुधार एवं विकास (School improvement and development)- विद्यालयी कार्यक्रमों एवं क्रियाओं हेतु आवश्यक उपलब्ध संसाधनों के कुशलतम उपयोग द्वारा यह नियोजन विद्यालय व्यवस्था में सुधार लाता है तथा विद्यालय के उत्थान एवं विकास को प्रोत्साहन देता है। कक्षा, पुस्तकालय, प्रयोगशाला शिक्षण कार्यक्रम, परीक्षा आदि सभी क्रियाओं में आने वाली बाधाओं को दूर करता है।

7.         सतत विकास (Continous plan)– संस्थागत नियोजन संस्था में सतत विकास को प्रोत्साहन देता है। समय-समय पर आने वाली बाधाओं को दूर करने की पूर्व तैयारी करता है।

8.         प्रजातंत्रीय दृष्टिकोण (Democratic outlook)– इस प्रकार के नियोजन में प्रबंधक, अधीनस्थों को भी सम्मिलित करता है। उनके सहयोग सुझाव आदि सुनता है एवं आवश्यक स्थानों पर उनके सुझावों के आधार पर निर्णय लेता है। अपने निर्णय सदस्यों पर थोपता नहीं है। इस प्रकार इस नियोजन में प्रजातंत्रीय दृष्टिकोण को अपनाया जाता है।

9.              समुदाय का सहयोग (Co-operation with the community) संस्थागत नियोजन हेतु संस्था, समुदाय के व्यक्तियों, अभिभावकों, सामर्थ्यवान विशेषज्ञों आदि का सहयोग लेती है, ताकि नियोजन के प्रत्येक स्तर पर छोटी से छोटी समस्या का हल ढूँढा जा सके। साथ ही संसाधनों की अनुपलब्धता की स्थिति में समुदाय द्वारा उनकी पूर्ति की जा सके।

10.       वैज्ञानिक एवं कार्यपरक (Scientific and task oriented)- यह नियोजन वैज्ञानिक विधियों को अपनाते हुए कार्यों एवं सेवाओं को केंद्रीय बिंदु के रूप में रखता है। इसमें कार्य प्रधानता होती है, न कि संबंध प्रधानता तथा सदस्यों द्वारा की जाने वाली क्रियाएँ ही महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं।

AarambhTV Team
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